महाशिवरात्रि के बाद पूजन सामग्री का क्या करें? कूड़ेदान में डालना माना जाता है अशुभ, जानें सही विसर्जन विधि

महाशिवरात्रि का पावन पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न होने के बाद अक्सर मन में एक प्रश्न उठता है—पूजा में अर्पित की गई सामग्रियों का उचित क्या किया जाए? कई लोग अनजाने में फूल, बेलपत्र या अन्य वस्तुएं कूड़े में डाल देते हैं, जबकि शास्त्रों में इसे अनुचित और अपमानजनक माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि देवपूजन में प्रयुक्त वस्तुओं का सम्मानपूर्वक विसर्जन करना चाहिए, तभी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि पूजन सामग्री को सामान्य कचरे के साथ नहीं फेंकना चाहिए। ऐसा करने से पूजा का प्रभाव कम हो सकता है और दोष भी लग सकता है। इसलिए जरूरी है कि सही विधि और मर्यादा का पालन करते हुए इन वस्तुओं का निष्पादन किया जाए।

इस प्रकार करें पूजन सामग्री का सम्मानजनक विसर्जन

भगवान शिव को अर्पित किए गए बेलपत्र और ताजे फूलों को किसी पेड़-पौधे की जड़ों में respectfully रख दें या स्वच्छ बहते जल में प्रवाहित करें।

यदि फूल सूख गए हों तो उन्हें एकत्रित कर जैविक खाद के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है, जिससे पर्यावरण को भी लाभ होगा।

शिवलिंग पर चढ़ाया गया दूध, दही, शहद या गन्ने का रस किसी वृक्ष की जड़ों में अर्पित कर दें। ध्यान रहे कि इन्हें नाली या गंदे स्थान पर न बहाएं।

पूजा में अर्पित फल और प्रसाद परिवारजनों, पड़ोसियों या जरूरतमंदों में बांट दें। प्रसाद बांटना पुण्यकारी माना गया है।

दीपक में बची हुई रूई और तेल को किसी साफ स्थान पर, विशेषकर किसी वृक्ष के नीचे रख सकते हैं।

अभिषेक का जल पवित्र पौधों में डालना शुभ माना जाता है। कुछ लोग इसे घर की छत या आंगन में छिड़कते भी हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

किन बातों का विशेष ध्यान रखें

किसी भी धार्मिक वस्तु को कूड़ेदान में न डालें।

पूजन सामग्री का अनादर न करें और उसे अपवित्र स्थान पर न फेंकें।

प्रसाद को स्वयं तक सीमित न रखें, बल्कि अधिक से अधिक लोगों में वितरित करें।

महाशिवरात्रि की पूजा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है। ऐसे में पूजा के बाद प्रयुक्त सामग्रियों का भी उतना ही सम्मान आवश्यक है जितना पूजन के समय रखा जाता है। यदि सही विधि से विसर्जन किया जाए तो भगवान शिव की कृपा बनी रहती है और पूजा का संपूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।