महाशिवरात्रि के दिन क्यों नहीं तोड़े जाते बेलपत्र? पहले ही कर लें संग्रह, जानिए शास्त्रों में बताए गए नियम

फाल्गुन मास को भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है। इसी माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन शिवभक्त उपवास रखकर विधिपूर्वक भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करते हैं। शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने की विशेष परंपरा है।

हालांकि, बेलपत्र चढ़ाने जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है उसे तोड़ने से जुड़े नियमों का पालन करना। शास्त्रों और पुराणों में बिल्वपत्र (बेलपत्र) तोड़ने के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। यदि इन नियमों का ध्यान रखा जाए, तो पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं इन धार्मिक नियमों के बारे में।

शिव पूजा में बेलपत्र का आध्यात्मिक महत्व

भगवान शिव को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं में बेलपत्र का विशेष स्थान है। इसे बिल्वपत्र भी कहा जाता है। शिवलिंग पर बेलपत्र के साथ भांग, धतूरा और श्वेत पुष्प चढ़ाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार बेलपत्र की तीन पत्तियां ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक मानी जाती हैं। इसलिए महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। ऐसा करने से शिवजी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

महाशिवरात्रि के दिन क्यों नहीं तोड़ा जाता बेलपत्र?

शास्त्रों के अनुसार सोमवार और चतुर्दशी तिथि को बेलपत्र तोड़ना वर्जित माना गया है। चूंकि महाशिवरात्रि स्वयं चतुर्दशी तिथि को आती है, इसलिए इस दिन बेलपत्र तोड़ने की मनाही है।

यदि पूजा के लिए बेलपत्र की आवश्यकता हो, तो उसे एक दिन पहले ही तोड़कर स्वच्छ स्थान पर सुरक्षित रख लेना चाहिए। मान्यता है कि निषिद्ध तिथियों में बेलपत्र तोड़ने से भगवान शिव अप्रसन्न हो सकते हैं। अतः नियमों का पालन करते हुए अर्पित किया गया बेलपत्र अधिक फलदायी होता है।

सोमवार को बेलपत्र तोड़ना क्यों माना गया है अशुभ?

सोमवार भगवान शिव को समर्पित दिन है। इस दिन शिव पूजा का विशेष महत्व होता है, लेकिन इसी दिन बेलपत्र तोड़ना अनुचित माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि सोमवार को बेलपत्र में माता पार्वती का वास रहता है। ऐसे में उस दिन पत्ते तोड़ना अनादर के समान समझा जाता है।

रविवार और द्वादशी तिथि से जुड़ा नियम

स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि रविवार और दोनों पक्षों की द्वादशी तिथि को भी बेलपत्र तोड़ना वर्जित है। हालांकि इन दिनों बेल वृक्ष की पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है। ऐसा करने से धन-धान्य और समृद्धि में वृद्धि होती है।

अन्य तिथियों में भी बरतें सावधानी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी भी माह की चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और संक्रांति तिथियों में भी बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, जब एक तिथि समाप्त होकर दूसरी तिथि प्रारंभ हो रही हो, उस संधिकाल में भी बेलपत्र तोड़ना उचित नहीं माना जाता। प्रदोष व्रत, शिवरात्रि और सोमवार के दिन भी बेलपत्र तोड़ने से बचना चाहिए।

बेलपत्र तोड़ते समय इन बातों का रखें विशेष ध्यान

- बेलपत्र तोड़ते समय कभी भी पूरी टहनी नहीं तोड़नी चाहिए। केवल पत्तियां सावधानीपूर्वक लें।

- पत्ते तोड़ने से पहले भगवान शिव का स्मरण करना शुभ माना जाता है।

- बेलपत्र लेने के बाद वृक्ष को प्रणाम अवश्य करें।

- शिवजी को कम से कम एक बेलपत्र अर्पित किया जा सकता है। यदि संभव हो तो 11 या 21 की संख्या में अर्पण करना अधिक शुभ माना जाता है।

- शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करते समय रखें ये नियम

- हमेशा तीन पत्तियों वाला बेलपत्र ही चढ़ाएं।

- यदि पांच पत्तियों वाला बेलपत्र मिल जाए तो उसे अत्यंत शुभ माना जाता है।

- कटे-फटे, दागदार या मुरझाए हुए बेलपत्र का प्रयोग न करें।

- बेलपत्र अर्पित करने से पहले उसे स्वच्छ जल से धो लें।

- कोशिश करें कि पूजा में ताजे बेलपत्र का ही उपयोग हो।

- शिवलिंग पर चढ़ाने से पहले बेलपत्र पर चंदन से ‘ॐ’ या ‘श्रीराम’ लिख सकते हैं।

- बेलपत्र का चिकना भाग शिवलिंग को स्पर्श करना चाहिए।

- अर्पण करते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप अवश्य करें।

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पंचांग आधारित जानकारी पर आधारित है। किसी विशेष निर्णय या अनुष्ठान से पहले योग्य पंडित या ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।