Bakrid 2018 : आखिर ईद पर बकरा, ऊंट आदि की ही क्यों दी जाती है कुर्बानी, शेर या चीते की क्यों नहीं

ईद-उल-जुहा अर्थात बकरीद को कुर्बानी का दिन माना जाता हैं और मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग इस दिन कुर्बानी के प्रतीक के रूप में जानवरों की कुर्बानी देते हैं। लेकिन इन जानवरों से जुडी भी कई बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखकर कुर्बानी दी जाती हैं। हर किसी जानवर की कुर्बानी नहीं दी जा सकती हैं। सभी के जहन में ये बात आती है कि इस दिन बकरा, ऊंट आदि की ही कुर्बानी क्यों दी जाती हैं। शेर या चीते की क्यों नहीं। तो आइये हम बताते हैं इसके बारे में।

* हलाल जानवरों की कुर्बानी है जायज़

बकरीद पर किन जानवरों की कुर्बानी की जा सकती है यह जानने से पहले इस बात की तस्दीक कर लेना होगा कि कौन से जानवर या परिंदे इस्लाम में हराम हैं और कौन से हलाल, जिन्हें खाए जाने की अनुमति है।आपको बतादे कि इस्लाम में वो चैपाए जानवर हराम किये गए हैं, जिनके पंजे होते हैं और जो आदमखोर या गोश्तखोर यानि मांसाहारी होते हैं। मिसाल के तौर पर शेर, लोमड़ी, सियार और चीता वगैरह। इसके अलावा गैर मांसाहारी चैपायों में भी वही जानवर हलाल करार दिये गए हैं जिनके खुर फटे हुए हों। मिसाल के तौर पर बकरा, ऊंट आदि।

* शिकार करने वाले जानवर खाना है हराम

आपको बता दें कि इस्लाम में उन परिन्दों को भी खाए जाने की इजाजत नहीं है जो शिकार कर अपना पेट भरते हैं और पंजों का भी इस्तेमाल करते हैं।रही बात बकरीद के मौके पर कुर्बानी की तो मांसाहारी यानि गोश्तखोर जानवर तो हलाल हैं ही नहीं इसलिये उनकी बात करना बेमानी है। इसके अलावा ऐसे जानवर जो हलाल तो हैं पर वह जंगली हैं उनकी भी कुर्बानी नहीं की जा सकती। ऊंट, दुम्बा, बकरा जैसे पालतू चैपायों की ही कुर्बानी बकरीद के मौके पर दी जा सकती है।