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Atal Tunnel Inauguration / सेना की मुश्किलों का हल है अटल टनल, सुरंग को ऐसे मिला स्वरूप

रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक महत्व की सुरंग बनाए जाने का ऐतिहासिक फैसला 3 जून, 2000 को लिया गया।

Posts by : Priyanka Maheshwari | Updated on: Sat, 03 Oct 2020 9:42:30

Atal Tunnel Inauguration /  सेना की मुश्किलों का हल है अटल टनल, सुरंग को ऐसे मिला स्वरूप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को हिमाचल के रोहतांग में अटल टनल का उद्घाटन (Atal Tunnel Inauguration) करेंगे। करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर बनी यह दुनिया की सबसे लंबी टनल है। इसकी लंबाई 9.2 किमी है। इसे बनाने में 10 साल का वक्त लगा। रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक महत्व की सुरंग बनाए जाने का ऐतिहासिक फैसला 3 जून, 2000 को लिया गया। जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। सुरंग के दक्षिणी हिस्से को जोडऩे वाली सड़क की आधारशिला 26 मई, 2002 को रखी गई थी। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के अधिकारियों के मुताबिक प्रोजेक्ट को 2003 में अंतिम तकनीकी स्वीकृति मिली। जून 2004 में परियोजना को लेकर भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश की गई।

सुरंग को ऐसे मिला स्वरूप

2005 में सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी की स्वीकृति मिलने के बाद 2007 में निविदा आमंत्रित की गई। दिसंबर 2006 में परियोजना के डिजाइन और विशेष विवरण की रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया गया। जून 2010 में यह सुरंग बनाने का काम शुरू कर दिया गया। इस परियोजना को फरवरी 2015 में ही पूरा होना था, लेकिन विभिन्न कारणों से इसमें देरी होती रही। मौसम की जटिलता और पानी के कारण कई बार निर्माण कार्य बीच में ही रोकना पड़ा।

टनल को बनाने के लिए खुदाई का काम 2011 में ही शुरू हो गया बीआरओ को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले 2015 में इस प्रोजेक्ट की समय सीमा थी। बाधाओं और चुनौतियों के कारण यह समय सीमा आगे खिसकती रही, लेकिन बीआरओ ने इस चुनौती का डटकर मुकाबला किया। इन चुनौतियों में निर्माण के दौरान सेरी नाला फॉल्ट जोन, जो तकरीबन 600 मीटर क्षेत्र का सबसे कठिन स्ट्रेच शामिल था। यहां एक सैकेंड में 140 लीटर पानी निकलता था। ऐसे में निर्माण बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण था। सुरंग के दोनों सिरों का मिलान 15 अक्टूबर, 2017 में हुआ। शुरुआत में टनल की लंबाई 8.8 किलोमीटर नापी गई थी, लेकिन निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अब इसकी पूरी लंबाई 9.02 किलोमीटर है। इसे बनाने में लगभग 3,000 संविदा कर्मचारियों और 650 नियमित कर्मचारियों ने 24 घंटे कई पारियों में काम किया।

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अटल टनल रोहतांग का सामरिक महत्व

सेना इस मार्ग से चीन से सटी सीमा लद्दाख और पाकिस्तान से सटे कारगिल तक आसानी से पहुंच जाएगी। टनल से मनाली और लेह के बीच दूरी 46 किमी कम हो गई है। मात्र डेढ़ घंटे में मनाली से केलांग पहुंच जाएंगे। दरअसल, 1954 से ही चीन भारत के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा था। उसने अपने नक्शों में भारतीय सीमा का काफी भाग अधिकार क्षेत्र में दिखाया था। भारत की सीमा तक चीन ने पक्की सड़कों का निर्माण कर लिया था। अत उसे सैन्य सामान तथा रसद पहुंचाने मे कोई कठिनाई नहीं हुई। भारत की सीमा पर उसके सैनिकों का जबर्दस्त जमाव था। युद्ध की दृष्टि से चीन की स्थिति सुदृढ़ थी। चीन पहाड़ी पर था, वह ऊंचाई से नीचे मौजूद भारतीय सेना पर प्रहार कर सकता था।

भारत सरकार द्वारा 1962 में भारत और चीन युद्ध के दौरान मिली हार के कारणों को जानने की कोशिश की गई तो पता लगा कि हार का कारण चीनी सीमा पर भारतीय जवानों को रसद तथा समय पर सहायता हेतु और सैनिकों का न पहुंच पाना था। इसके बाद ऐसे मार्ग की कल्पना की गई थी जो समय पर रसद और सेना की पहुंच मनाली से लेह तक करवा सके। इसके बाद 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी कारगिल की पहाडिय़ों पर पाकिस्तान के जवानों द्वारा श्रीनगर-लेह मार्ग पर गुजर रही सेना के वाहनों और जवानों को भारी नुकसान पहुंचाया गया। उस समय मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग-तीन से सेना और रसद को कारगिल पहुंचाया गया। उस समय मनाली से लेह तक पहुंचने के लिए करीब 450 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी। जिससे न केवल अतिरिक्त समय गंवाना पड़ता था बल्कि शून्य से नीचे तापमान होने के चलते सेना को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। इन सभी कठिनाईयों को देखते हुए मनाली और लाहुल के बीच रोहतांग में सुरंग बनाने का प्रारूप तैयार हुआ।

10.5 मीटर चौड़ी, 10 मीटर ऊंची टनल की खासियत

- 2958 करोड़ रुपए खर्च आया।
- 14508 मीट्रिक स्टील लगा।
- 2,37,596 मीट्रिक सीमेंट का इस्तेमाल हुआ।
- 14 लाख घन मीटर चट्टानों की खुदाई हुई।
- हर 150 मीटर की दूरी पर 4-जी की सुविधा।

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