टैरिफ की धमकियों से उकता गया यूरोप, ट्रंप को मिलने वाला है डबल झटका, 27 देशों ने लिया बड़ा फैसला, ट्रेड डील पर संकट और भारत ...

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लगातार टैरिफ धमकियों का असर अब वैश्विक स्तर पर साफ दिखने लगा है। एक ओर यूरोपीय यूनियन (EU) भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की औपचारिक घोषणा की तैयारी में है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच पहले से मौजूद व्यापार समझौते पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूरोपीय संसद बुधवार, 21 जनवरी 2026 को फ्रांस के स्ट्रॉसबर्ग में अमेरिका के साथ ट्रेड डील को सस्पेंड करने का ऐलान कर सकती है।

अमेरिका-ईयू ट्रेड डील पर लटक रही तलवार

यूरोप और अमेरिका के बीच यह व्यापार समझौता जुलाई 2025 में स्कॉटलैंड में संपन्न हुआ था। उस वक्त अमेरिका ने यूरोपीय देशों से आने वाले उत्पादों पर टैरिफ 30 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया था। इसके बदले में यूरोपीय देशों ने अमेरिका में निवेश बढ़ाने और अमेरिकी निर्यात को प्रोत्साहन देने पर सहमति जताई थी। हालांकि, अब हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। ग्रीनलैंड मुद्दे को लेकर ट्रंप का रुख सख्त होता जा रहा है और उन्होंने दबाव बनाने के लिए अगले महीने से यूरोप पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है।

ग्रीनलैंड विवाद बना तनाव की बड़ी वजह


डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को लेकर खुले तौर पर अमेरिका का प्रभाव बढ़ाने की बात कर चुके हैं। उनका मानना है कि इस क्षेत्र में चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियां अमेरिका की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं। ग्रीनलैंड दुनिया के सबसे बड़े द्वीपों में गिना जाता है और पिछले करीब 300 वर्षों से यह डेनमार्क के अधीन है। वर्ष 1979 में डेनमार्क ने ग्रीनलैंड को सीमित स्वायत्तता दी थी, जिसके तहत विदेश नीति, रक्षा और आर्थिक मामलों को छोड़कर अन्य विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय प्रशासन को दिया गया।

ग्रीनलैंड डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है और चूंकि डेनमार्क नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) का सदस्य है, इसलिए ग्रीनलैंड को भी नाटो सुरक्षा कवच प्राप्त है। इसी कारण नाटो सदस्य देशों ने वहां अपने सैनिक भी तैनात किए हैं।

टैरिफ ऐलान से भड़के यूरोपीय देश

ग्रीनलैंड पर ट्रंप के रुख का विरोध करने वाले यूरोपीय देशों पर अमेरिका ने सीधा निशाना साधा है। ट्रंप ने आठ यूरोपीय देशों—डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड्स और फिनलैंड—पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। यह टैरिफ 1 फरवरी से लागू होंगे। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर यह भी संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर इन टैरिफ दरों को और बढ़ाया जा सकता है। ये सभी देश ग्रीनलैंड मुद्दे पर डेनमार्क के समर्थन में खड़े हैं।

यूरोप की कड़ी प्रतिक्रिया, टैरिफ को बताया दबाव की राजनीति

ब्रिटेन और फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों ने ट्रंप की इस नीति की खुलकर आलोचना की है। फ्रांस के विदेश मंत्री ने अमेरिकी टैरिफ नीति को ‘ब्लैकमेलिंग’ करार दिया है और कहा है कि दबाव बनाकर किसी देश से समर्थन हासिल करना स्वीकार्य नहीं है। इसी नाराजगी का असर अब अमेरिका-ईयू व्यापार संबंधों पर भी पड़ता नजर आ रहा है।

27 जनवरी को भारत-ईयू FTA का होगा ऐलान

इसी बीच भारत और यूरोपीय यूनियन के रिश्तों में नई मजबूती देखने को मिल रही है। 27 जनवरी को भारत और ईयू के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की औपचारिक घोषणा होने जा रही है। इस समझौते के तहत दोनों पक्ष एक-दूसरे के बाजारों में आसान पहुंच देंगे। एफटीए लागू होने के बाद भारतीय उत्पादों को ईयू के 27 देशों में कम या शून्य टैरिफ पर प्रवेश मिलेगा, वहीं यूरोपीय सामानों को भारतीय बाजार में भी इसी तरह की सुविधा दी जाएगी।

भारत पर भी टैरिफ का दबाव बना चुका है अमेरिका


गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप पहले ही भारत पर टैरिफ बढ़ा चुके हैं। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया है। ऐसे में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच एफटीए को अमेरिका की टैरिफ नीति के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता वैश्विक व्यापार संतुलन में बड़ा बदलाव ला सकता है और अमेरिका के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकता है।