पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को बड़ा झटका लगने के बाद पार्टी से अलग हुए बागी सांसदों के गुट में भी अब असंतोष के संकेत दिखाई देने लगे हैं। बताया जा रहा है कि टीएमसी की करारी हार के बाद 20 सांसदों ने पार्टी से बगावत करते हुए नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का दामन थाम लिया था। इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यह माना जा रहा था कि इन सांसदों का रुख एनडीए और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पक्ष में रहेगा।
हालांकि, अब बागी गुट के भीतर ही मतभेद उभरने की खबरें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन सांसद ऐसे हैं जो बीजेपी के साथ बढ़ती नजदीकी से सहज नहीं हैं। इन सांसदों में पूर्व भारतीय क्रिकेटर और बहरामपुर से सांसद यूसुफ पठान के अलावा मुर्शिदाबाद से अबू ताहिर खान और जंगीपुर से खलीलुर रहमान का नाम बताया जा रहा है।
तीनों सांसद मुस्लिम बहुल इलाकों से चुनकर संसद पहुंचे हैं और माना जा रहा है कि उनके लिए अपने क्षेत्र के मतदाताओं के बीच राजनीतिक पकड़ बनाए रखना सबसे अहम मुद्दा है। इसी वजह से बीजेपी के साथ खुलकर नजदीकी बढ़ाने को लेकर उनके मन में आशंकाएं पैदा हो रही हैं।
BJP से नजदीकी को लेकर क्यों परेशान हैं तीनों सांसद?सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, इन तीनों सांसदों का मानना है कि अगर वे बीजेपी के साथ बहुत ज्यादा करीबी दिखाते हैं तो उनके पारंपरिक वोट बैंक पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि उनके संसदीय क्षेत्रों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां ऐसी हैं, जहां बीजेपी के साथ सीधा जुड़ाव उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकता है।
यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान और खलीलुर रहमान को आशंका है कि बीजेपी के साथ बढ़ती नजदीकी उनके क्षेत्र के मतदाताओं के बीच गलत संदेश दे सकती है। उनके मुताबिक, अगर उनकी राजनीति और पार्टी की गतिविधियां स्थानीय जनता की भावनाओं के विपरीत जाती हैं तो आने वाले समय में उन्हें इसका खामियाजा चुनावी स्तर पर भुगतना पड़ सकता है।
इसी कारण बागी गुट के भीतर भी यह सवाल उठने लगा है कि सभी सांसद एनडीए के साथ एक जैसी राजनीतिक लाइन पर चलेंगे या आने वाले दिनों में कुछ सांसद अपनी अलग रणनीति अपनाएंगे।
NDA की बैठक से भी तीनों सांसद रहे दूरहाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई एनडीए की बैठक में भी यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान और खलीलुर रहमान के शामिल नहीं होने की बात सामने आई। उनकी गैरमौजूदगी को बागी गुट के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, दिल्ली में शुभेंदु अधिकारी की ओर से आयोजित एक बैठक में ये तीनों सांसद मौजूद रहे। इस बैठक में शामिल होने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य बीजेपी के साथ किसी राजनीतिक गठजोड़ को मजबूत करना नहीं था, बल्कि पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के मुद्दे पर अपनी बात रखने के लिए वे वहां पहुंचे थे।
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में चर्चा को और तेज कर दिया है। एक तरफ बागी सांसदों का एक वर्ग एनडीए के करीब जाता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ सांसद अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर सावधानी बरतते नजर आ रहे हैं।
अबू ताहिर खान ने NDA में शामिल होने से किया इनकारमुर्शिदाबाद से सांसद अबू ताहिर खान ने हाल ही में साफ किया कि वह एनडीए का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कुछ सहयोगी दलों के सांसदों के लिए आयोजित नाश्ते की बैठक में जरूर शामिल हुए थे।
अबू ताहिर ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री के साथ बैठक में उनकी मौजूदगी को एनडीए को समर्थन देने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह बैठक उनके लिए अपने संसदीय क्षेत्र और पश्चिम बंगाल से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को सीधे प्रधानमंत्री के सामने रखने का मौका थी।
उन्होंने बताया कि जिन विषयों को उन्होंने बैठक में उठाया, उनमें राज्य में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान मतदाताओं के नाम कथित तौर पर हटाए जाने का मुद्दा भी शामिल था। इसके अलावा मस्जिदों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर पाबंदी और उनके संसदीय क्षेत्र में नई रेलवे लाइन की मांग जैसे मुद्दों पर भी उन्होंने अपनी बात रखी।
अबू ताहिर का कहना है कि प्रधानमंत्री से मुलाकात का मकसद अपनी चिंताओं को सीधे केंद्र सरकार तक पहुंचाना था, न कि बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन का संकेत देना।
बागी सांसदों को लेकर TMC में भी जारी है सियासी हमलादूसरी ओर, टीएमसी के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी समेत कुछ नेता अब भी ममता बनर्जी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। कल्याण बनर्जी ने बागी सांसदों के रुख पर सवाल उठाते हुए उन पर लोगों को भ्रमित करने का आरोप लगाया है।
कल्याण बनर्जी का कहना है कि बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र देकर खुद को एनसीपीआई का सदस्य बताया था। उनका दावा है कि एनसीपीआई पहले से ही एनडीए का हिस्सा है। ऐसे में बागी सांसदों की राजनीतिक स्थिति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
टीएमसी की ओर से यह भी संकेत दिया जा रहा है कि बागी सांसदों का मौजूदा रुख और उनके अलग-अलग राजनीतिक बयान पूरे घटनाक्रम को और पेचीदा बना रहे हैं। वहीं बागी सांसदों की ओर से यह स्पष्ट करने की कोशिश की जा रही है कि एनडीए से जुड़े नेताओं या बैठकों में उनकी मौजूदगी को सीधे गठबंधन में शामिल होने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
आगे क्या होगा बागी सांसदों का रुख?फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि यूसुफ पठान समेत ये तीन सांसद आने वाले दिनों में किस राजनीतिक रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। एक तरफ उनके लिए अपने संसदीय क्षेत्रों में राजनीतिक आधार और मतदाताओं का भरोसा बनाए रखना अहम है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली की राजनीति में बदलते समीकरण भी उनके फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।
बागी सांसदों के गुट में पहले ही अलग-अलग विचार सामने आने लगे हैं। ऐसे में तीन सांसदों का बीजेपी और एनडीए से दूरी बनाने वाला रुख इस गुट के भीतर संभावित मतभेदों की ओर इशारा करता है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ये सांसद अपनी वर्तमान स्थिति पर कायम रहते हैं या फिर बदलते राजनीतिक हालात के साथ अपना रुख बदलते हैं। फिलहाल इतना जरूर है कि टीएमसी से अलग हुए सांसदों का गुट पूरी तरह एकजुट नजर नहीं आ रहा और बीजेपी के साथ रिश्ते को लेकर उसके भीतर भी अलग-अलग राय सामने आने लगी है।
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