जयपुर में दो नगर निगमों के विलय के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका, अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को

जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर में हैरिटेज और ग्रेटर नगर निगमों के विलय को लेकर जारी विवाद अब अदालत के दरवाजे तक पहुंच चुका है। इस विलय के खिलाफ कांग्रेस नेता आरआर तिवारी द्वारा दायर जनहित याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए अगली तारीख 30 अक्टूबर तय की है।

हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस बीएस संधु की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को राज्य सरकार के जवाब पर प्रति-जवाब दायर करने की अनुमति देते हुए सुनवाई स्थगित की।

सरकार का पक्ष: जनहित नहीं, निजी स्वार्थ है याचिका का उद्देश्य

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता कांग्रेस जिला अध्यक्ष हैं और वे 2023 में हवामहल सीट से चुनाव लड़ चुके हैं, इसलिए यह याचिका व्यक्तिगत राजनीतिक मंशा से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि नगर निगमों के विलय का निर्णय जनहित और प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखकर लिया गया है।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि दो नगर निगमों को बनाए रखना राजकोष पर भारी आर्थिक बोझ डालता है। दो-दो नगर निगमों के लिए अलग-अलग बुनियादी ढांचा, स्टाफ, भवन, वाहन और तकनीकी संसाधन की आवश्यकता होती है, जो व्यर्थ खर्च को बढ़ाता है।

याचिकाकर्ता का पक्ष: मनमाना और असंवैधानिक फैसला

वहीं याचिकाकर्ता के वकील प्रेमचंद देवंदा ने अदालत में कहा कि 27 मार्च 2025 को जारी की गई अधिसूचना न सिर्फ मनमानी है, बल्कि यह संविधान और नगर पालिका अधिनियम के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि दो निगमों के विलय से जयपुर जैसे 45 लाख से अधिक आबादी वाले शहर में जनप्रतिनिधित्व घट जाएगा।

याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि विलय के बाद वार्डों की संख्या 250 से घटाकर 150 कर दी गई है, जबकि शहर में शामिल 80 गांवों की 1.75 लाख की आबादी को भी निगम क्षेत्र में शामिल किया गया है। यह कदम न केवल विकास कार्यों को प्रभावित करेगा, बल्कि प्रशासनिक पहुंच और जवाबदेही को भी कमजोर करेगा।

अदालत ने स्कूल हादसे पर भी मांगा जवाब


इस बीच, हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने झालावाड़ के पिपलोदी में हाल ही में हुए स्कूल भवन हादसे पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ ने इस मामले में स्वप्रेरणा से संज्ञान लेते हुए पूछा कि हादसे से पूर्व स्कूलों के लिए कितना बजट आवंटित किया गया था और अब क्या कदम उठाए गए हैं।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने बताया कि जर्जर स्कूलों को चिन्हित कर लिया गया है और वहां के बच्चों को वैकल्पिक भवनों में पढ़ाया जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अब किसी भी जर्जर भवन में कक्षाएं नहीं लगाई जाएं। साथ ही सरकार को 9 अक्टूबर तक बजट और कार्ययोजना का पूरा विवरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भी निर्देश दिए हैं कि वे यह जांच कर रिपोर्ट दें कि राज्य सरकार की ओर से जर्जर स्कूलों को लेकर की गई व्यवस्थाएं स्थल पर कितनी प्रभावी हैं।