राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस साल अपनी स्थापना की 100वीं वर्षगांठ मना रहा है और इसी उपलक्ष्य में आयोजित विजयादशमी उत्सव में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। यह समारोह 2 अक्टूबर 2025 को सुबह 7.40 बजे रेशमबाग, नागपुर में आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी अपने भाषण के माध्यम से उपस्थित लोगों को संबोधित करेंगे।
रामनाथ कोविंद देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति रहे हैं, के.आर. नारायणन के बाद। उनकी नियुक्ति उस समय हुई जब देश में जाति और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर व्यापक चर्चा चल रही थी। आरएसएस पर लंबे समय तक यह आरोप लगाया जाता रहा कि उसका दृष्टिकोण ब्राह्मणवादी है, यानी वह ऊंची जातियों के पक्ष में कार्य करता है। हालांकि, हाल के वर्षों में संघ ने जातीय समरसता और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। संघ के वरिष्ठ नेताओं ने बार-बार कहा है कि जाति के आधार पर भेदभाव को खत्म करना केवल एक रणनीति नहीं, बल्कि हिंदुओं की एकता को मजबूत करने के उनके मिशन का अनिवार्य हिस्सा है।
पिछले वर्षों में आरएसएस के विजयादशमी समारोह में विभिन्न प्रतिष्ठित व्यक्तित्व मुख्य अतिथि रहे हैं। साल 2024 में पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. कोप्पिल्लील राधाकृष्णन मुख्य अतिथि थे, जिन्होंने पहली ही कोशिश में भारत को मंगल मिशन में सफलता दिलाई थी। वहीं 2023 में प्रसिद्ध गायक और संगीतकार पद्मश्री शंकर महादेवन, और 2022 में माउंट एवरेस्ट को दो बार फतह करने वाली पद्मश्री संतोष यादव मुख्य अतिथि थीं। संतोष यादव वह पहली महिला पर्वतारोही थीं जिन्हें इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।
आरएसएस की स्थापना 1925 में नागपुर में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। डॉक्टर हेडगेवार हिंदू राष्ट्रवादी विचारक विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से प्रेरित थे। शुरुआत में उन्होंने कुछ समय के लिए कांग्रेस पार्टी से जुड़कर काम किया, लेकिन विचारों में मतभेद होने के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और आरएसएस का गठन किया। आज 100 वर्ष बाद, यह संगठन अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से भारत में हिंदू एकता और राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहा है।