29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में UGC द्वारा लागू किए गए नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की शुरुआत हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और अधिकार देता है। ऐसे में कोई भी नियम ऐसा नहीं होना चाहिए, जो समाज में भ्रम फैलाए या किसी भी स्तर पर भेदभाव को बढ़ावा दे। उन्होंने कहा कि नए प्रावधानों में केवल OBC, SC और ST वर्गों का ही विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जो अपने आप में सवाल खड़े करता है।
नियम 3(c) से बढ़ेगा सामाजिक विभाजन: याचिकाकर्तायाचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि UGC नियमों के अंतर्गत नियम 3(e) में पहले से ही भेदभाव की व्यापक परिभाषा मौजूद है। ऐसे में नियम 3(c) को जोड़ने की आवश्यकता ही क्या थी? उनके अनुसार यह नया प्रावधान समाज में वर्गीकरण और अलगाव की भावना को मजबूत करता है। वकील ने कहा कि भेदभाव केवल कुछ तय सामाजिक वर्गों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके उदाहरण अन्य समूहों में भी देखने को मिलते हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वे जानबूझकर ऐसे उदाहरण अदालत में नहीं रख रहे हैं।
अनुच्छेद 14 की कसौटी पर नियमों की जांच: CJIइस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अदालत का फोकस इस बात पर है कि क्या नए UGC नियम संविधान के अनुच्छेद 14, यानी समानता के अधिकार, की कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर अतिरिक्त उदाहरणों की आवश्यकता नहीं है। अदालत केवल यह परखना चाहती है कि क्या ये नियम सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करते हैं।
‘कुछ वर्गों के लिए अलग प्रावधान क्यों?’— वकील का सवालयाचिकाकर्ता पक्ष ने CJI सूर्यकांत से आग्रह किया कि नियम 3(c) पर तत्काल रोक लगाई जाए। उनका कहना था कि इस धारा में यह मान लिया गया है कि भेदभाव केवल कुछ खास सामाजिक वर्गों के साथ ही हो सकता है, जो एक खतरनाक धारणा है। इस पर CJI ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “अगर कोई दक्षिण भारत का छात्र उत्तर भारत के किसी कॉलेज में पढ़ने आता है और उसके साथ अनुचित टिप्पणी या व्यवहार होता है, तो क्या नियम 3(e) उसे कवर करता है?”
इस पर वकील ने सहमति जताते हुए कहा कि बिल्कुल करता है। उन्होंने दोहराया कि यही उनकी मूल आपत्ति है—जब पहले से मौजूद नियम सभी प्रकार के भेदभाव को समाहित करता है, तो कुछ जातियों या वर्गों के लिए अलग से विशेष धारा जोड़ने की कोई संवैधानिक या व्यावहारिक जरूरत नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से सुनते हुए UGC के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी।