कांवड़ मार्ग पर दुकानों पर QR कोड लगाने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, 15 जुलाई को होगी सुनवाई

नई दिल्ली। कांवड़ यात्रा मार्ग पर दुकान और भोजनालय मालिकों की पहचान को सार्वजनिक करने के उद्देश्य से लगाए जाने वाले QR कोड के निर्देशों के खिलाफ एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह कदम न केवल गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि यह धर्म और जाति के आधार पर भेदभावपूर्ण प्रोफाइलिंग को बढ़ावा देता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही रोक चुका है।

याचिका शिक्षाविद अपूर्वानंद झा और अन्य लोगों द्वारा दाखिल की गई है। इसमें उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा 25 जून को जारी उस प्रेस रिलीज का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया था कि कांवड़ यात्रा मार्ग पर सभी भोजनालयों को ऐसे QR कोड लगाने होंगे जिनमें मालिक का नाम और अन्य पहचान विवरण दर्शाए जाएंगे।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि यह कदम विवादास्पद और असंवैधानिक है, क्योंकि इससे दुकानदारों को उनकी जाति और धर्म के आधार पर पहचानने और उन्हें निशाना बनाने का अवसर मिलता है। इसमें यह भी कहा गया है कि इसे कानूनी लाइसेंस की आड़ में लागू किया जा रहा है, जो मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

धार्मिक तुष्टिकरण के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यवसाय पर हमला

गौरतलब है कि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकारों द्वारा इसी तरह के निर्देशों पर स्थगन आदेश जारी किया था। उस समय भी इन राज्यों ने कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित खाने-पीने की दुकानों और ढाबों पर मालिकों और कर्मचारियों की पहचान उजागर करने के निर्देश दिए थे, जिसे न्यायालय ने धार्मिक भेदभाव की श्रेणी में माना था।

कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु गंगा से पवित्र जल भरकर भगवान शिव का अभिषेक करने निकलते हैं। यह यात्रा सावन मास में होती है, जब अधिकांश श्रद्धालु मांसाहार, प्याज-लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों से परहेज़ करते हैं। ऐसे में स्थानीय प्रशासन इन धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए दुकानों के संचालन को नियंत्रित करना चाहता है। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह धार्मिक तुष्टिकरण के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यवसाय की आज़ादी पर सीधा हमला है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई 15 जुलाई को करेगा। यह देखा जाना बाकी है कि क्या शीर्ष अदालत पहले की तरह इस बार भी राज्य सरकार के आदेशों पर रोक लगाती है, या फिर मामले को गहन सुनवाई के लिए लंबित रखती है।

यह मामला सिर्फ कांवड़ यात्रा मार्ग तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर निजता के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, और व्यवसाय की निष्पक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाले समय में राज्य प्रशासन की ऐसी नीतियों के लिए एक न्यायिक मानक तय कर सकता है।