सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत क्यों बढ़ी? कोर्ट ने कानून के प्रति अनादर का किया जिक्र

सीजेपी नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई है। सोमवार को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत ने दोनों की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनके आचरण से कानून के प्रति सम्मान की कमी दिखाई देती है। अदालत ने पुलिस जांच का हवाला देते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने आम लोगों को इकट्ठा होने और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए कथित तौर पर उकसाया था।

अदालत के आदेश में जांच अधिकारी की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, सौरव दास और आशुतोष रांका सीजेपी के सदस्य हैं। आरोप है कि उन्होंने लोगों को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के लिए जुटने के लिए प्रेरित किया, जबकि इस स्थान को अब प्रदर्शनों के लिए निर्धारित जगहों की सूची से हटा दिया गया है। अदालत ने जमानत पर विचार करते हुए जांच अधिकारी की ओर से पेश किए गए तथ्यों और दोनों नेताओं के कथित आचरण को ध्यान में रखा।

अदालत ने हिरासत बढ़ाने के पीछे क्या वजह बताई?

सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि तिहाड़ जेल में बंद सौरव दास और आशुतोष रांका ने 11 अक्टूबर को दिए गए अपने आश्वासनों का उल्लंघन किया है। अदालत के मुताबिक, इस आचरण से भविष्य में भी ऐसे कृत्य दोहराए जाने की आशंका पैदा होती है।

पुलिस की ओर से दी गई जानकारी का हवाला देते हुए आदेश में कहा गया कि दोनों नेताओं ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस जैसी जगहों पर बार-बार विरोध प्रदर्शन करने की अपील की। पुलिस का आरोप है कि इन स्थानों पर प्रदर्शन के लिए निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि दोनों नेताओं को विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति इस आश्वासन पर दी गई थी कि वे निर्धारित शर्तों का सख्ती से पालन करेंगे। हालांकि, अदालत के अनुसार, वे इन शर्तों का पालन करने में विफल रहे। इसी आधार पर उनके आचरण और भविष्य में नियमों के उल्लंघन की आशंका पर सवाल उठाए गए। आदेश में अदालत ने कहा, “हमारे सामने पेश की गई आशंकाओं के आधार से साफ पता चलता है कि प्रतिवादियों का आचरण सही नहीं है बल्कि यह कानून के प्रति उनके अनादर को दर्शाता है और यह भी दिखाता है कि वे उन जगहों पर विरोध-प्रदर्शन बुलाने के आदी हैं, जहां इसकी अनुमति नहीं है।”
शांति भंग होने की आशंका का भी किया जिक्र

अदालत ने अपने आदेश में सार्वजनिक शांति और व्यवस्था से जुड़े पहलू को भी अहम माना। उसने कहा कि जांच अधिकारी की ओर से दायर आवेदन के समर्थन में रिकॉर्ड पर ठोस सामग्री मौजूद है। अदालत के मुताबिक, इस सामग्री से शांति भंग होने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की गंभीर आशंका सामने आती है, जिसे उचित विचार किए बिना नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ाने का आदेश दिया। अदालत ने दोनों नेताओं के पिछले आचरण और मौजूदा खतरे की आशंका का उल्लेख करते हुए जमानत देने से इनकार किया।

जमानतदारों की पात्रता पर भी अदालत ने उठाए सवाल

न्यायिक हिरासत बढ़ाने के फैसले के साथ अदालत ने बचाव पक्ष की ओर से पेश किए गए जमानतदारों की पात्रता पर भी टिप्पणी की। आदेश के अनुसार, बचाव पक्ष के वकील ने जिन लोगों को जमानतदार के रूप में पेश किया था, उन्हें अदालत ने जमानत देने के योग्य नहीं माना।

अदालत ने इसकी वजह जमानत बॉन्ड और आधार कार्ड पर लगी तस्वीरों के बीच कथित तौर पर स्पष्ट मेल नहीं होना बताया। इस विसंगति को भी जमानत की प्रक्रिया पर विचार करते समय ध्यान में रखा गया। इस तरह अदालत के आदेश में एक ओर जांच अधिकारी की रिपोर्ट, विरोध प्रदर्शन से जुड़ी शर्तों के कथित उल्लंघन और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर जताई गई आशंका का उल्लेख हुआ, वहीं दूसरी ओर जमानतदारों की पात्रता का मुद्दा भी सामने आया।

रत्ना सिंह ने अदालती कार्यवाही पर उठाए सवाल

दूसरी ओर, सीजेपी ने अपने नेताओं की लगातार हिरासत और अदालती कार्यवाही की आलोचना की है। पार्टी ने इस कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया का मजाक बताया और आरोप लगाया कि सरकार अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रही है। सीजेपी ने जमानत की सुनवाई को एक ढोंग करार देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक आवाजों को दबाना था। सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने कहा कि पार्टी के वकीलों ने अदालत के सामने पूरी तरह कानूनी बिंदुओं पर अपनी दलीलें रखीं, लेकिन अधिकारी सार्वजनिक शांति को खतरा होने का कोई सबूत पेश नहीं कर सके। उन्होंने कहा, “हमारे वकीलों ने पूरी तरह से कानूनी बिंदुओं पर बात रखी, फिर भी अधिकारी ऐसा एक भी सबूत पेश नहीं कर पाए, जिससे यह साबित हो सके कि सार्वजनिक शांति को कोई खतरा है।”

रत्ना सिंह ने उस आरोप को भी खारिज किया कि सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत के बाद युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन ने उनकी रिहाई की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया था। इस तरह, जहां अदालत ने पुलिस जांच में सामने आए तथ्यों और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर जताई गई आशंकाओं के आधार पर दोनों नेताओं की हिरासत बढ़ाई, वहीं सीजेपी ने सुनवाई की निष्पक्षता और कार्रवाई के उद्देश्य पर सवाल उठाए हैं।