ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची PIL, SIR के दौरान लिए गए फैसलों को रद्द करने और 13 करोड़ नामों की जांच की मांग

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े उन फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है, जिन्हें याचिकाकर्ता के मुताबिक अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिया या लागू किया गया। याचिका में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए करीब 13 करोड़ नामों की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी SIT गठित करने की मांग भी की गई है।

यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दाखिल की है और इसे अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से पेश किया गया है। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और चुनाव आयोग की आईटी प्रमुख सीमा खन्ना को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने इन अधिकारियों के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत कथित वैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की मांग की है।

क्या है याचिका में मुख्य मांग?

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि चुनाव आयोग द्वारा लिए गए उन सभी फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को अवैध और शून्य घोषित किया जाए, जिन्हें याचिकाकर्ता के अनुसार आयोग के बहुमत की सहमति के बिना लिया गया। इसके साथ ही SIR से संबंधित मूल Form 6 को बहाल करने की मांग की गई है। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला वैधानिक फॉर्म है।

याचिका में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए करीब 13 करोड़ नामों की जांच के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या SIT गठित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने प्रस्ताव रखा है कि इस जांच की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में हो और इसमें साइबर सुरक्षा तथा आईटी विशेषज्ञों की मदद ली जाए। याचिका में चुनाव आयोग के ECINet और ERONet डेटाबेस का फोरेंसिक ऑडिट कराने की बात भी कही गई है।

14 बार आपत्ति दर्ज कराने की रिपोर्ट के बाद दाखिल हुई याचिका

यह याचिका ऐसे समय दाखिल हुई है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने और बहाल करने, SIR से जुड़े फैसलों तथा मतदाता डेटा की व्यवस्था से था।

रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में कहा था कि संबंधित फैसले या आदेश उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। एक मामले में Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। दोनों आयुक्तों की आपत्तियों की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी दी गई थी।
SIR और Form 6 को लेकर क्या विवाद है?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, Form 6 में बदलाव को लेकर भी चुनाव आयोग के भीतर आपत्ति दर्ज की गई थी। रिपोर्ट में बताया गया कि नए मतदाता के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म में SIR के पिछले रिकॉर्ड से संबंधित अतिरिक्त जानकारी मांगी जाने लगी थी। इस बदलाव की प्रक्रिया और इसके लिए अपनाए गए तरीके पर चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए थे।

याचिका में इसी तरह के बदलावों और SIR से संबंधित अन्य फैसलों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने मूल वैधानिक Form 6 को बहाल करने की मांग की है। इसके अलावा याचिका में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े 16.10 लाख अपीलों के दाखिल होने की प्रक्रिया की भी जांच की मांग की गई है।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के कामकाज और SIR को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हुई है। हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक चुनाव आयोग ने इस तरह के मतभेदों को आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा बताया है और कहा है कि प्रमुख फैसले पूरे आयोग की सहमति से लिए गए।

इस बीच, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 24 सितंबर को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के लिए ‘देशद्रोही’ शब्द का इस्तेमाल किया और चुनावी प्रक्रिया में कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर गंभीर आरोप लगाए। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें उन्होंने चुनाव आयोग से जुड़े विवाद और SIR को लेकर उठाया है।

अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL में की गई मांगों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया क्या दिशा लेती है, यह अदालत के समक्ष होने वाली सुनवाई और आदेशों से तय होगा।