यूजीसी बिल 2026 पर जेडीयू का स्पष्ट स्टैंड, ‘किसी भी वर्ग में असंतोष लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं’

यूजीसी बिल 2026 को लेकर देशभर में चल रही बहस के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने अपना रुख साफ कर दिया है। पार्टी के प्रवक्ता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने कहा कि भारत का संविधान डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की देन है, जो हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार देता है। ऐसे में यदि किसी भी सामाजिक वर्ग में उपेक्षा या नाराजगी का भाव पैदा होता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।

नीरज कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा “न्याय के साथ विकास” और “सबका सम्मान” की राजनीति के प्रतीक रहे हैं। यूजीसी के हाल में लागू किए गए नए रेगुलेशन को लेकर विभिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, लेकिन इस विषय पर अंतिम फैसला न्यायपालिका के हाथ में है। चूंकि यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, ऐसे में अदालत का निर्णय सभी के लिए सर्वोपरि और मान्य होगा।

यूजीसी की नई गाइडलाइंस पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस 2026 इसी महीने प्रभाव में आए हैं, जिनको लेकर अलग-अलग वर्गों में असहमति देखी जा रही है। नए नियमों में ओबीसी वर्ग को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा के दायरे में शामिल किया गया है। वहीं, झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर जुर्माना या निलंबन जैसे प्रावधानों को हटाए जाने से भी विवाद गहराया है।

सामान्य वर्ग से जुड़े संगठनों का कहना है कि इन नियमों का दुरुपयोग कर उन्हें निशाना बनाया जा सकता है। उनका दावा है कि यदि कोई व्यक्ति गलत या झूठी शिकायत दर्ज कराता है, तो उसे किसी प्रकार के दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिससे कानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।

नई गाइडलाइंस से गरमाया सियासी माहौल

यूजीसी की नई गाइडलाइंस ने खास तौर पर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कई पदाधिकारियों ने इन नियमों के विरोध में अपने पद तक छोड़ दिए हैं। इसी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को गैर-समावेशी तरीके से पेश किया गया है और कुछ वर्गों को संस्थागत सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट से नियमों पर रोक की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि मौजूदा स्वरूप में इन नियमों को लागू करने पर रोक लगाई जाए। साथ ही, जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को ‘जाति-तटस्थ और संविधान सम्मत’ तरीके से दोबारा तय करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भेदभाव की परिभाषा ऐसी होनी चाहिए, जिससे जाति के आधार पर उत्पीड़न का शिकार होने वाले हर व्यक्ति को सुरक्षा मिल सके, चाहे उसकी जातिगत पहचान कुछ भी हो।

इसके अलावा, याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को अंतरिम निर्देश देने की भी मांग की गई है, ताकि ‘समान अवसर केंद्र’, ‘समानता हेल्पलाइन’ जैसे प्रावधानों को बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुलभ बनाया जा सके। अब इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जा रहा है, जो आगे की दिशा तय करेगा।