बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, महागठबंधन के भीतर खींचतान और तनाव और ज़्यादा गहराता जा रहा है। इस बार कांग्रेस खुद अपनी ही चुनौतियों में उलझती दिख रही है। टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी में इस हद तक आक्रोश फैल चुका है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता आनंद माधव ने साफ कह दिया कि कांग्रेस इस बार 10 सीटें भी नहीं जीत पाएगी। यह बयान किसी विरोधी पार्टी से नहीं बल्कि खुद कांग्रेस के अंदर से आया है, जो पार्टी की जमीनी स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
खुले मंच से कांग्रेस नेतृत्व पर निशानाटिकट वितरण में पक्षपात और पैसे के लेनदेन के आरोप कांग्रेस नेताओं ने अब सार्वजनिक रूप से लगाने शुरू कर दिए हैं। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और प्रभारी कृष्णा अल्लावरु पर खुले तौर पर दलाली और अनुचित निर्णयों का आरोप लगाते हुए कई वरिष्ठ नेताओं ने बगावती सुर अपना लिए हैं। आनंद माधव ने पार्टी के रिसर्च सेल से इस्तीफा दे दिया और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नेतृत्व पर जमकर हमला बोला। उनके साथ कई अन्य नेता भी मंच पर मौजूद थे, जिन्होंने एकजुट होकर कांग्रेस की टिकट नीति पर सवाल उठाए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि राजेश राम, कृष्णा अल्लावरु और शकील अहमद खान की तिकड़ी राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी दोनों को नुकसान पहुंचा रही है। इन नेताओं ने दावा किया कि टिकटों की बोली लगी है और योग्य व ज़मीनी नेताओं को नजरअंदाज कर दिया गया है।
छत्रपति यादव की अनदेखी बनी विरोध की वजहखगड़िया से मौजूदा विधायक छत्रपति यादव को इस बार टिकट नहीं दिया गया, जिससे असंतोष और बढ़ गया। उनकी जगह एआईसीसी सचिव चंदन यादव को मैदान में उतारा गया है, जो पिछली बार जेडीयू उम्मीदवार से हार चुके हैं। आनंद माधव और अन्य नेताओं का कहना है कि यदि किसी विधायक का टिकट काटा जाता है तो उसे कहीं और से चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए, न कि एकदम से किनारे कर दिया जाए।
कांग्रेस की अंदरूनी कलह के बीच महागठबंधन की बड़ी तस्वीर भी उतनी ही असहज है। राजद, कांग्रेस, वामपंथी दल, वीआईपी और अन्य दलों के बीच सीटों का फार्मूला तय नहीं हो पाया है, जिससे कई सीटों पर एक से अधिक गठबंधन उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल कर दिया है। इससे फ्रेंडली फाइट जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राजग के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
मुख्यमंत्री पद पर भी आम राय नहींराजद ने तेजस्वी यादव को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, जबकि कांग्रेस की तरफ से अब तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। वहीं वीआईपी के मुकेश सहनी खुद को उपमुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं और इसी को लेकर उन्होंने भी कुछ समय तक गठबंधन से बाहर निकलने का संकेत दिया था। बाद में पार्टी नेताओं की मध्यस्थता के बाद मामला सुलझा।
झामुमो का महागठबंधन से अलग होना एक और झटकाझारखंड मुक्ति मोर्चा ने बिहार में राजद के व्यवहार से नाराज होकर खुद को गठबंधन से अलग कर लिया है। हेमंत सोरेन ने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी अब छह सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जिनमें चकाई, कटोरिया और जमुई जैसी प्रमुख सीटें शामिल हैं। झामुमो का कहना है कि बिहार में उनकी लगातार अनदेखी हुई है, जबकि झारखंड में उन्होंने राजद को सीटें दीं।
वीआईपी के गणेश भारती ने कुशेश्वरस्थान सीट से नामांकन दाखिल किया, लेकिन पार्टी चिह्न न मिलने के कारण अब उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ना पड़ेगा। वहीं, राजग की ओर से भी एक झटका तब लगा जब भोजपुरी अभिनेत्री और लोजपा (रामविलास) की उम्मीदवार सीमा सिंह का नामांकन मढ़ौरा सीट से खारिज हो गया।
कुल मिलाकर कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई, महागठबंधन में समन्वय की कमी और घटक दलों के बीच आपसी अविश्वास ने इस चुनाव को बेहद अस्थिर बना दिया है। इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है, जो हर सीट पर एकजुट और संगठित नजर आ रही है।