शनिवार को एक बार फिर मानवता का क़त्ल करने वाली घटना हुई जहां पीबीएम हॉस्पिटल के पास नाले में नवजात का शव तैरते मिला। हद तो तब हो गई जब थाने के सीमाविवाद के चलते सूचना देने के बाद भी काफी देर तक पुलिस नहीं आई। दो घंटे बाद सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश भदौरिया ने नाले से बच्चे का शव उठाया। पुलिस नहीं पहुंची तो भदौरिया ही जेएनवी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने भी पहुंचे। दो से तीन दिन उम्र के नवजात के हाथ में कैनुला और इसे चिपकाने वाली अढेसिव लगी थी। संभवतया इस पर्ची पर कोई नाम या नंबर होंगे लेकिन वह पानी में धुल गए। ऐसे में देखकर लगा पीबीएम में जन्म के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई होगी।
हैरानी तब हुई जब सामने लगभग 200 मीटर पर मौजूद पुलिस चौकी को फोन किया तो वहां से कोई नहीं आया। थोड़ी देर में एक फोन सदर थाना पुलिस को किया गया। वहां से भी जवाब नहीं मिला। जयनारायण व्यास कॉलोनी में किसी को जवाब मिला, यह हलका हमारा नहीं है। लगभग दो घंटे बाद यहां पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश भदौरिया ने शव को नाले से निकाला तब दो कांस्टेबल पहुंचे। उन्होंने भी खुद को जेएनवी थाने का बताया लेकिन यह हलका उनके क्षेत्र में होने पर अनभिज्ञता जताई। आखिरकार सीओ के हस्तक्षेप पर जेएनवी थानाधिकारी के नाम भदौरिया ने रिपोर्ट दी।निर्ममता; प्रदेश में हर साल 276 जिंदगियां गर्भ से सीधे नाले तक जाती हैं
पीबीएम के आस-पास नालों में ममता का यह रूप बार-बार देखने को मिलता है। हर साल औसतन चार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में तीन साल में 264 भ्रूण और 575 नवजात शिशु मिलने के मामले सामने आए। इस लिहाज से देखा जाए तो हर वर्ष 276 नवजातों या अजन्मों की जिंदगी गर्भ से सीधे नाले में जाकर खत्म हो जाती है।