ICICI बैंक की पूर्व CEO चंदा कोचर के खिलाफ एक बार फिर बड़ा खुलासा हुआ है। भारत की एक अपीलीय ट्रिब्यूनल ने उन्हें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में दोषी पाया है। यह मामला साल 2009 का है, जब ICICI बैंक ने वीडियोकॉन ग्रुप को 300 करोड़ रुपये का लोन मंजूर किया था। अब सामने आया है कि इसके बदले में चंदा कोचर ने अपने पति दीपक कोचर के जरिए 64 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह ‘क्विड प्रो क्वो’ (Quid Pro Quo – बदले में कुछ पाने) का क्लासिक उदाहरण है, जिसमें पद का दुरुपयोग करके निजी फायदे के लिए संस्थागत निर्णय लिए गए।
कैसे हुई थी रिश्वत की डील?3 जुलाई को ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में बताया कि चंदा कोचर ने अपने पति दीपक कोचर की कंपनी न्यूपावर रिन्यूएबल्स प्राइवेट लिमिटेड (NRPL) के जरिए यह रिश्वत ली थी। जैसे ही 27 अगस्त 2009 को वीडियोकॉन ग्रुप को लोन मिला, ठीक अगले दिन SEPL (वीडियोकॉन ग्रुप की सहयोगी कंपनी) ने 64 करोड़ रुपये दीपक कोचर की कंपनी के खाते में ट्रांसफर कर दिए। यह लेन-देन पूरी तरह से पूर्वनियोजित प्रतीत होता है, जिसे धनशोधन के रूप में अंजाम दिया गया।
ED और PMLA की भूमिकाइस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत की थी। जांच में यह पाया गया कि NRPL नामक कंपनी भले ही वी.एन. धूत (CMD, वीडियोकॉन) द्वारा शुरू की गई हो, लेकिन बाद में उसका नियंत्रण दीपक कोचर के पास चला गया। PMLA की धारा 50 के तहत दिए गए बयानों और दस्तावेजों से यह साफ हुआ कि रिश्वत सीधे लोन के बदले में दी गई थी। ED ने चंदा कोचर की 78 करोड़ रुपये की संपत्ति को भी अटैच किया था, जिसे नवंबर 2020 में एक निर्णायक प्राधिकरण ने रिलीज कर दिया था। अब ट्रिब्यूनल ने इस फैसले को भी गलत ठहराते हुए कहा कि तथ्यात्मक अनदेखी की गई थी।
बैंक को हुआ करोड़ों का नुकसानट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि इस घोटाले से ICICI बैंक को गंभीर वित्तीय नुकसान हुआ है। वीडियोकॉन को दिया गया 300 करोड़ रुपये का लोन बाद में NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) में बदल गया और बैंक की बैलेंस शीट पर इसका सीधा असर पड़ा। इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने भी अपनी जांच शुरू कर दी है। CBI के अनुसार, चंदा कोचर ने ICICI बैंक की CEO रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग कर वीडियोकॉन को अनुचित लाभ पहुंचाया। यह मामला 2012 में दिए गए ICICI कंसोर्टियम लोन (1,875 करोड़ रुपये) से जुड़ा है, जिसमें ICICI की हिस्सेदारी 300 करोड़ थी।