कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने गुरुवार (8 जनवरी, 2026) को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर अपनी सोच को विस्तार से रखा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह नेहरू के प्रशंसक जरूर हैं, लेकिन किसी भी कीमत पर उनके अंध समर्थक नहीं हैं। थरूर के मुताबिक, नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका और योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी जरूरी है कि उनकी गलतियों को ईमानदारी से स्वीकार किया जाए। उन्होंने कहा कि नेहरू ने भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव रखी, लेकिन हर राष्ट्रीय समस्या का ठीकरा सिर्फ उन्हीं के सिर फोड़ देना न्यायसंगत नहीं है।
शशि थरूर ने यह बातें केरल लेजिस्लेटिव असेंबली इंटरनेशनल बुक फेस्टिवल के मंच से कहीं। इस दौरान उन्होंने मौजूदा बीजेपी सरकार की राजनीति पर भी टिप्पणी की। थरूर ने कहा कि वर्तमान सत्ता नेहरू को लेकर बेहद आलोचनात्मक रवैया अपनाए हुए है और हर बड़ी-छोटी विफलता के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है। उन्होंने माना कि कुछ मामलों में नेहरू की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन हर मुद्दे को नेहरू से जोड़ देना एकतरफा सोच को दर्शाता है।
अपने संबोधन में थरूर ने कहा, “मैं जवाहरलाल नेहरू का सम्मान करता हूं और उनकी सोच तथा दूरदर्शिता का प्रशंसक हूं, लेकिन मैं उनका अंधभक्त नहीं हूं। उनके कई निर्णय ऐसे रहे हैं, जिनसे देश को मजबूती मिली और जिनके लिए उनकी प्रशंसा होनी चाहिए। लोकतंत्र की स्थापना और उसे मजबूत करने में नेहरू की भूमिका ऐतिहासिक रही है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह कहना गलत होगा कि मौजूदा सरकार लोकतंत्र विरोधी है, लेकिन इतना जरूर है कि उसका रुख नेहरू के प्रति बेहद नकारात्मक रहा है। आज की राजनीति में नेहरू एक तरह से “बलि का बकरा” बना दिए गए हैं।
शशि थरूर ने 1962 के भारत-चीन युद्ध का भी जिक्र किया और कहा कि उस हार के पीछे लिए गए कुछ फैसलों की जिम्मेदारी नेहरू पर डाली जा सकती है। उन्होंने माना कि उस दौर में हुई रणनीतिक चूक पर आलोचना होना स्वाभाविक है। लेकिन थरूर का कहना था कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि हर समस्या, हर विवाद और हर असफलता के लिए नेहरू को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, चाहे उसका उनसे कोई सीधा संबंध हो या नहीं। उन्होंने दो टूक कहा कि इतिहास को संतुलित नजरिए से देखने की जरूरत है, न कि राजनीतिक फायदे के लिए उसे बार-बार तोड़-मरोड़ कर पेश करने की।