नए मतदाताओं के लिए वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने की प्रक्रिया से जुड़ा चुनाव आयोग का एक अहम फैसला बदल गया है। भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने ऑनलाइन Form 6 से स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की घोषणा को अलग कर दिया है। अब जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया चल रही है, वहां भी नए मतदाताओं को पंजीकरण के लिए Form 6 और SIR से संबंधित घोषणा अलग-अलग भरनी होगी। पहले यह घोषणा Form 6 के भीतर ही शामिल थी और आवेदक के लिए इसका जवाब देना अनिवार्य था।
4 नवंबर 2026 को सामने आए इस बदलाव की खास बात यह है कि पिछले करीब छह सप्ताह में चुनाव आयोग ने Form 6 को लेकर तीसरी बार अपना रुख बदला है। आयोग के दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी पहले ही इस व्यवस्था पर आपत्ति जता चुके थे। उनका कहना था कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना Form 6 के प्रारूप में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। अब आयोग ने दोनों प्रक्रियाओं को अलग कर दिया है।
Form 6 में क्या बदलाव किया गया है?Form 6 का इस्तेमाल पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिक वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल कराने के लिए करते हैं। ECINet पोर्टल पर उपलब्ध इस ऑनलाइन फॉर्म में पहले सेक्शन J और K के बीच SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा दिखाई जाती थी। इस घोषणा के तहत आवेदक को तीन विकल्पों में से किसी एक को चुनना पड़ता था।
- क्या उसका अपना नाम 2000 के शुरुआती वर्षों में हुई पिछली स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान तैयार मतदाता सूची में शामिल था?
- क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था?
- क्या न तो आवेदक का और न ही उसके माता-पिता का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में मौजूद था?
इस जानकारी को दिए बिना आवेदक Form 6 की ऑनलाइन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकता था। यानी नए मतदाता के पंजीकरण के साथ ही उसे पिछली SIR की मतदाता सूची से अपने या अपने परिवार के संबंध की जानकारी देना जरूरी था। अब चुनाव आयोग ने इस घोषणा को Form 6 से अलग कर दिया है। ECINet पोर्टल पर मतदाता पंजीकरण के लिए Form 6 और SIR से संबंधित घोषणा के लिए अलग विकल्प उपलब्ध हैं। इस तरह दोनों प्रक्रियाओं को अलग-अलग पूरा किया जा सकता है।
दो चुनाव आयुक्तों ने क्यों जताई थी आपत्ति?Form 6 में SIR की घोषणा जोड़ने के फैसले पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने अलग-अलग समय पर सवाल उठाए थे। विवेक जोशी ने 16 मई 2026 को इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका तर्क था कि Form 6 का प्रारूप कानून के तहत निर्धारित है और उसमें बदलाव करने के लिए विधिक संशोधन जरूरी है। वहीं, सुखबीर सिंह संधू ने 19 मई को इस मुद्दे पर अपनी सहमति जताई थी। बाद में 13 अगस्त को उन्होंने इस बदलाव को अनधिकृत और अवैध बताते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही थी।
इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन Form 6 में SIR की घोषणा शामिल कर दी गई थी। 12 जुलाई को इस बदलाव की जानकारी सार्वजनिक हुई थी। इसके बाद 23 सितंबर को दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का मामला सामने आया। विवाद की मुख्य वजह Form 6 की कानूनी स्थिति थी। इसका प्रारूप मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के तहत तय किया गया है। इसमें संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा अपने स्तर पर ऑनलाइन फॉर्म में अतिरिक्त घोषणा को अनिवार्य बनाने पर सवाल उठे थे।
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देने के बाद बदला फैसलाइस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया था। इसमें आयोग ने बताया कि उसकी इलेक्टोरल रोल (ER) डिवीजन ने 21 अक्टूबर को ही Form 6 और SIR की घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला कर लिया था। आयोग ने अपने हलफनामे में यह भी बताया कि शुरुआत में दोनों प्रक्रियाओं को एक ही ऑनलाइन फॉर्म में रखने का उद्देश्य नए मतदाताओं के लिए आवेदन आसान बनाना था। दरअसल, अगर Form 6 और SIR की घोषणा अलग-अलग भरी जाती, तो आवेदकों को दो बार OTP जनरेट करना पड़ता और दो बार ई-सिग्नेचर की प्रक्रिया पूरी करनी होती। दोनों को एक साथ रखने पर एक ही OTP और एक ई-सिग्नेचर से काम पूरा हो जाता था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर SIR की घोषणा को जिस तरीके से Form 6 के भीतर प्रदर्शित किया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि निर्धारित वैधानिक फॉर्म में संशोधन कर दिया गया है।
हलफनामे में आयोग ने स्पष्ट किया कि Form 6 में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। इसी कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए दोनों प्रक्रियाओं को अलग करने का निर्णय लिया गया। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आयोग ने अपने हलफनामे में यह दावा बरकरार रखा कि Form 6 में औपचारिक संशोधन नहीं किया गया था। उसका कहना था कि SIR की घोषणा अलग दस्तावेज थी, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उसकी प्रस्तुति से भ्रम पैदा हो सकता था।
छह सप्ताह में तीसरी बार बदला Form 6 को लेकर फैसलाForm 6 से जुड़ा विवाद एक बार में खत्म नहीं हुआ। पिछले छह सप्ताह के घटनाक्रम को देखें तो चुनाव आयोग ने इस मुद्दे पर तीन अलग-अलग रुख अपनाए।
- पहला फैसला: जुलाई 2026 में ऑनलाइन Form 6 के भीतर SIR की घोषणा को शामिल किया गया। इसके बाद आवेदकों के लिए इसका जवाब देना अनिवार्य हो गया।
- दूसरा फैसला: सितंबर में आयोग ने स्पष्ट किया कि Form 6 में कोई बदलाव नहीं हुआ है और SIR की घोषणा को अलग अतिरिक्त दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि, जिन राज्यों में SIR जारी था, वहां ऑनलाइन फॉर्म में यह घोषणा बनी रही।
- तीसरा फैसला: 21 अक्टूबर को इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने दोनों प्रक्रियाओं को पूरी तरह अलग करने का निर्णय लिया। 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में इसकी जानकारी दी गई और अब 4 नवंबर को यह व्यवस्था ECINet पोर्टल पर अलग-अलग विकल्पों के रूप में दिखाई दे रही है।
इससे पहले सितंबर में आयोग ने यह भी कहा था कि SIR के दौरान घोषणा को Form 6 के साथ जोड़ने की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। हालांकि, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित Form 6 को न तो मंजूरी दी है और न ही उसे खारिज किया है। इसके बाद आयोग ने 21 अक्टूबर को दोनों दस्तावेज अलग करने का निर्णय लिया।
पिछले पांच सप्ताह में आयोग ने कई फैसलों में किए बदलावForm 6 का मामला चुनाव आयोग के भीतर उठी आपत्तियों और उसके बाद हुए बदलावों का अकेला उदाहरण नहीं है। सितंबर में सामने आई एक विस्तृत जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कम से कम 14 फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने, हटाए गए नामों को दोबारा शामिल करने, चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर और प्रशासनिक कामकाज से था। रिपोर्ट सामने आने के बाद पिछले पांच सप्ताह में आयोग ने कई व्यवस्थाओं में बदलाव किए हैं। इनमें आयोग की बैठकों से लेकर अधिकारियों की विदेश यात्राओं और तकनीकी प्रणालियों की मंजूरी तक के मामले शामिल हैं।
1. आयोग की बैठकों के लिए एजेंडा और कार्यवाही का विवरण जरूरीपहले दोनों चुनाव आयुक्तों ने शिकायत की थी कि आयोग की बैठकों से पहले एजेंडा साझा नहीं किया जा रहा था और बैठकों के बाद उनका विवरण भी उपलब्ध नहीं कराया जाता था। अब नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक बैठक से पहले एजेंडा साझा किया जाएगा। बैठक समाप्त होने के बाद उसकी कार्यवाही का विवरण भी जारी किया जाएगा। इससे आयोग के कामकाज में पारदर्शिता और फैसलों की जानकारी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया मजबूत होगी।
2. अधिकारियों के विदेश दौरे के लिए आयोग की मंजूरीचुनाव आयोग के अधिकारियों की विदेश यात्राओं को लेकर भी आपत्ति उठाई गई थी। दोनों आयुक्तों का कहना था कि कुछ अधिकारी आयोग की अनुमति के बिना विदेश दौरे कर रहे थे। इसके बाद व्यवस्था में बदलाव किया गया है। अब अधिकारियों को विदेश यात्रा पर जाने से पहले चुनाव आयोग की मंजूरी लेनी होगी।
3. नए IT सिस्टम और पोर्टल के लिए तय होगी मंजूरी प्रक्रियाचुनाव आयोग के महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना के नेतृत्व में तैयार किए जा रहे नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल को लेकर भी सवाल उठे थे।नई व्यवस्था के अनुसार, ऐसे तकनीकी मॉड्यूल और पोर्टल पहले अधिकारियों की समिति (Committee of Officers) के सामने रखे जाएंगे। समिति की समीक्षा के बाद उन्हें अंतिम मंजूरी के लिए चुनाव आयोग के पास भेजा जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आयोग के महत्वपूर्ण तकनीकी सिस्टम में बदलाव बिना उचित समीक्षा और मंजूरी के लागू न हों।
4. ECINet पोर्टल का होगा ऑडिटचुनाव आयोग ने 14 अक्टूबर को जारी सर्कुलर के माध्यम से ECINet प्लेटफॉर्म की जांच के लिए एक समिति गठित की थी। इस समिति का उद्देश्य यह पता लगाना है कि पोर्टल संबंधित कानूनों और नियमों के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं। समिति की अध्यक्षता वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त करेंगे। इसमें अन्य वरिष्ठ निर्वाचन अधिकारी भी शामिल होंगे। इसके अलावा IIT बॉम्बे और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है। विवेक जोशी ने इससे पहले 29 मई को ECINet के ऑडिट की मांग उठाई थी। उनका कहना था कि मतदाता सूची से संबंधित डेटा का नियंत्रण धीरे-धीरे केंद्रीकृत होता जा रहा है। सुखबीर सिंह संधू ने भी 13 जुलाई को इस प्रस्ताव का समर्थन किया था और 14 अगस्त को दर्ज टिप्पणी में कहा था कि इस प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई नहीं हुई है।
5. जमीनी स्तर के अधिकारियों को मिले अधिक अधिकार
मतदाता सूची में नाम जोड़ने और दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया में भी बदलाव किए गए हैं। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने 24 सितंबर को ECINet सॉफ्टवेयर में चार बदलाव करने का प्रस्ताव दिया था। आयोग ने इन बदलावों को लागू किया। नई व्यवस्था के तहत जिन मतदाताओं को दस्तावेजों की कमी या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किया जाता है, उनकी व्यक्तिगत सुनवाई अब सामान्य प्रक्रिया के बजाय अपवादस्वरूप होगी। ऐसे मामलों में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) मतदाताओं के घर जाकर जरूरी दस्तावेज जुटाएंगे। इसके अलावा मतदाता अब 13 निर्धारित श्रेणियों के अलावा अन्य दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे। पहले दस्तावेजों की स्वीकार्यता को लेकर सीमाएं थीं। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) को भी तार्किक विसंगतियों से जुड़े मामलों में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है। अब ऐसे मामलों को अनिवार्य रूप से जिला निर्वाचन अधिकारी के पास भेजने की जरूरत नहीं होगी। एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव के तहत पिछली SIR की मतदाता सूची का अंश अपलोड करने की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गई है। इससे मतदाताओं और जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को प्रक्रिया पूरी करने में सहूलियत मिलने की उम्मीद है।
गोवा के 97 मतदाताओं के नाम जुड़वाने का मामला भी उठा
चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर से जुड़ी एक अन्य समस्या गोवा में सामने आई थी। जांच में पता चला कि ECINet सॉफ्टवेयर के कारण 97 ऐसे मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में दोबारा शामिल नहीं हो पा रहे थे, जिन्हें ड्राफ्ट सूची से हटा दिया गया था। इन मतदाताओं ने जरूरी दस्तावेज जमा कर दिए थे और राज्य के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) ने भी उनके नाम बहाल करने की मंजूरी दे दी थी। इसके बावजूद ECINet में नाम दोबारा जोड़ने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस समस्या को लेकर सात दिनों के भीतर आठ बार दिल्ली में पत्र भेजे थे। इन पत्रों की प्रतियां महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना को भी भेजी गई थीं।
इस मामले में आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में आयोग ने बताया कि 97 में से 88 लोगों ने Form 6 भर दिया था और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए थे। छह लोग देश से बाहर थे, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे। इसके अलावा आयोग ने उन राज्यों में विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया था, जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इसका उद्देश्य उन पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना था, जिनके नाम किसी कारणवश छूट गए थे। आयोग ने अक्टूबर में 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Summary Revision) कराने का भी आदेश दिया। इसका एक प्रमुख उद्देश्य 2027 में 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आसान बनाना है।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों पर भी उठे थे सवाल
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का एक अन्य मामला पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े अपील प्रकरणों का था। सुखबीर सिंह संधू ने 12 अगस्त को अपने अधिकारियों के सामने पांच सवाल रखे थे। ये सवाल उन अपीलों से जुड़े थे, जो न्यायिक अधिकारियों के आदेश के बाद मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दाखिल की गई थीं। उन्होंने अपीलों की कुल संख्या, अलग-अलग श्रेणियों में उनका बंटवारा, क्या चुनाव आयोग ने स्वयं अपील की थी, इन्हें दाखिल करने की अनुमति किसने दी और वास्तव में किस अधिकारी ने अपील दाखिल की, जैसी जानकारी मांगी थी। संधू ने अपनी टिप्पणी में यह भी दर्ज किया था कि जब उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से इस बारे में जानकारी मांगी, तो उन्होंने कहा कि उनके पास इन मामलों का पूरा विवरण नहीं है। बाद में 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में आयोग ने बताया कि अपील दाखिल करने के लिए आयोग के भीतर अलग से अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही SIR से जुड़े मामलों में अपील करने वाले अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट कर चुका था। आयोग ने यह भी बताया कि 22 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, अपीलें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के तहत सक्षम अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र में दाखिल की थीं। हलफनामे में यह भी कहा गया कि इन मामलों की जानकारी आयोग के सामने नहीं लाई गई थी। हालांकि, आयोग ने इन अपीलों की कुल संख्या का खुलासा नहीं किया। हलफनामे में यह जानकारी भी दी गई कि जिन मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ अपील की गई थी, उनके नाम मतदाता सूची में मौजूद थे और उन्होंने हालिया विधानसभा चुनावों में मतदान भी किया था। इन अपीलों को वापस लेने की जानकारी भी नहीं दी गई।
चुनाव आयोग ने सभी फैसलों को बताया सर्वसम्मति से लिया गयादूसरी ओर, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में आयोग के भीतर एकतरफा फैसले लिए जाने के आरोपों को खारिज किया था। आयोग का कहना था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं। आयोग ने यह भी दलील दी कि किसी चुनाव आयुक्त की ओर से फाइल पर दर्ज की गई टिप्पणी, सुझाव या आपत्ति अपने आप में आयोग का आधिकारिक फैसला नहीं होती। हलफनामे में कहा गया कि आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से ही जवाब दाखिल करने की मंजूरी दी गई थी। आयोग के मुताबिक, कुछ अधिकारियों को सौंपी गई जिम्मेदारियों के दौरान ऐसी प्रक्रियाएं अपनाई गईं, जिनमें सुधार की जरूरत थी। इसी वजह से प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर कुछ बदलाव किए गए हैं। इस तरह Form 6 से SIR की घोषणा अलग करने का फैसला केवल नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले कुछ सप्ताह में चुनाव आयोग के प्रशासनिक और तकनीकी कामकाज में हुए बदलावों की भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
FAQs:
Q1. Form 6 क्या है और इसका इस्तेमाल किसलिए किया जाता है?Form 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं द्वारा अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाने के लिए किया जाता है। 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पात्र नागरिक इसके जरिए पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं।
Q2. चुनाव आयोग ने Form 6 से SIR का कॉलम क्यों हटाया है?ऑनलाइन फॉर्म में SIR की घोषणा शामिल करने से ऐसा लग सकता था कि निर्धारित वैधानिक Form 6 में संशोधन किया गया है। आयोग ने इसी भ्रम को दूर करने के लिए दोनों प्रक्रियाओं को अलग कर दिया।
Q3. Form 6 में बदलाव पर किन चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी?चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि Form 6 में संशोधन के लिए कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।
Q4. नए मतदाताओं को अब ECINet पोर्टल पर क्या करना होगा?जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया जारी है, वहां नए मतदाताओं को Form 6 के जरिए पंजीकरण करना होगा और SIR से संबंधित घोषणा अलग से भरनी होगी।
Q5. चुनाव आयोग ने ECINet पोर्टल के ऑडिट के लिए क्या कदम उठाया है?आयोग ने 14 अक्टूबर को एक समिति गठित की थी, जो ECINet की जांच करेगी। इसमें वरिष्ठ निर्वाचन अधिकारियों के साथ IIT बॉम्बे और IISc बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल हैं।