भारतीय जनता पार्टी (BJP) इन दिनों अपने शीर्ष नेतृत्व के चुनाव को लेकर अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। पार्टी जहां पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ आपसी तालमेल बनाकर नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम पर सहमति तलाशने में जुटी थी, वहीं अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अप्रत्याशित इस्तीफे ने उसे नई दुविधा में डाल दिया है। इस घटनाक्रम ने अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया को और विलंबित कर दिया है। अब पार्टी का फोकस नए उपराष्ट्रपति के चयन पर शिफ्ट हो गया है, जिससे संगठनात्मक पुनर्गठन की चर्चाएं फिलहाल ठंडी पड़ती दिख रही हैं। इससे पहले भी पार्टी के भीतर राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया था, और अब नए घटनाक्रम ने इस प्रक्रिया को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया है।
संगठनात्मक नियुक्तियों पर भी पड़ी असरइस विलंब का प्रभाव राज्यों के संगठनात्मक ढांचे पर भी साफ नजर आ रहा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा रुकी होने के चलते कई राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति अधर में लटकी हुई है। पार्टी कार्यकर्ताओं में इसको लेकर निराशा है, खासकर उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे बड़े और प्रभावशाली राज्यों में, जहां नए नेतृत्व की घोषणा का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है।
फिलहाल ऐसा लगता है कि संसद का मानसून सत्र बीत जाने के बाद ही इस पर कोई ठोस निर्णय हो सकेगा। लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी भी जल्द शुरू होनी है, जिससे इस प्रक्रिया में और देरी की संभावना जताई जा रही है।
कौन-कौन हैं रेस में?पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए जिन नामों पर मंथन चल रहा है, उनमें केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, शिवराज सिंह चौहान, मनोहर लाल खट्टर और भूपेंद्र यादव शामिल हैं। इनमें से कुछ नेताओं का नाम संगठन में अनुभव और जमीनी पकड़ के कारण मजबूत माना जा रहा है, वहीं कुछ नाम सामाजिक संतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के दृष्टिकोण से चर्चा में हैं।
अब तक 28 राज्यों में नए अध्यक्षBJP अब तक 36 में से 28 राज्यों में नए अध्यक्षों की नियुक्ति कर चुकी है, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व परिवर्तन की तैयारी में है। हालांकि, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में नेतृत्व का सवाल अब भी खुला है। इन राज्यों में नियुक्तियों को लेकर असमंजस बरकरार है और संभव है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के तय होने तक यह स्थिति बनी रहे।
धनखड़ के इस्तीफे ने जहां बीजेपी की प्राथमिकताओं में अचानक बदलाव ला दिया है, वहीं संगठनात्मक ढांचे को लेकर पार्टी के अंदर चल रही तैयारियों को भी धीमा कर दिया है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि उपराष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी किसे मिलती है और इसके बाद बीजेपी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया को किस दिशा में ले जाती है। फ़िलहाल तो कार्यकर्ताओं और पार्टी समर्थकों को और प्रतीक्षा करनी होगी।