मालेगांव विस्फोट केस: 17 साल बाद भी अनसुलझे रह गए ये 7 सवाल, साध्वी प्रज्ञा समेत सभी आरोपी क्यों हुए बरी?

मालेगांव बम धमाके के बहुचर्चित मामले में आखिरकार 18 साल बाद न्यायालय का फैसला सामने आया। विशेष एनआईए अदालत ने इस केस में सभी आरोपियों — साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल श्रीकांत पुरोहित, रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी और सुधाकर द्विवेदी — को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

फैसले में न्यायाधीश एके लाहोटी ने यह स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा, जिससे यह साबित नहीं हो पाया कि इन व्यक्तियों का विस्फोट में सीधा या परोक्ष रूप से कोई हाथ था। उन्होंने यह भी दोहराया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। अदालत के अनुसार, कई ऐसे बुनियादी सवाल थे जिनके उत्तर जांच एजेंसियाँ कभी नहीं दे सकीं — और इन्हीं कारणों से पूरा मामला कमजोर पड़ गया।

17 वर्षों में नहीं मिले इन 7 सवालों के उत्तर:


साजिश की बैठकों के प्रमाण नहीं मिले : केस की शुरुआत इस बात से हुई कि आरोपियों ने धमाके की साजिश के लिए बैठकें की थीं, मगर अदालत में ऐसे किसी आयोजन का प्रमाण नहीं दिया जा सका।

स्पॉट पंचनामा में गंभीर खामियाँ : घटना स्थल का पंचनामा असंगत और अधूरा पाया गया। कई तथ्यों को सिर्फ मौखिक रूप से रखा गया, दस्तावेज़ी पुष्टि नहीं हो सकी।

बाइक की मिल्कियत साबित नहीं हुई : जिस बाइक में विस्फोट हुआ, उसे साध्वी प्रज्ञा से जोड़ने के लिए कोई पुख्ता दस्तावेज़ पेश नहीं किया गया। बाइक का चेसिस नंबर तक ठीक से नहीं बताया गया।

आरडीएक्स और बम निर्माण के सबूत नहीं : आरोप था कि कर्नल पुरोहित ने कश्मीर से आरडीएक्स मंगवाकर बम तैयार किया, लेकिन जांच में इसकी कोई पुष्टि नहीं हो सकी।

बम लगाने वाले की पहचान नहीं : यह भी पता नहीं चल पाया कि आखिरकार मस्जिद के पास बम प्लांट किसने किया।

धमाका बाइक में हुआ, यह भी साबित नहीं : विस्फोट बाइक में हुआ या उसके पास, यह भी जांच में स्पष्ट नहीं किया जा सका।

बाइक किसने खड़ी की, इसका प्रमाण भी नहीं : घटनास्थल पर विस्फोटक युक्त बाइक को किसने पार्क किया — इसका कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

अदालत ने किस आधार पर साध्वी प्रज्ञा को निर्दोष माना?

कोर्ट के मुताबिक साध्वी प्रज्ञा की उस बाइक से कोई ठोस कनेक्शन साबित नहीं हो सका, जिसमें विस्फोट हुआ। न्यायालय ने इस बात को विशेष रूप से दर्ज किया कि जिस वक्त की बात हो रही है, उस समय वह पहले ही संन्यास ले चुकी थीं। न तो उनके खिलाफ कोई ठोस दस्तावेज़ी साजिश का प्रमाण मिला, और न ही यह साबित किया जा सका कि वे किसी आतंकी योजना में शामिल थीं।

कर्नल पुरोहित के पक्ष में क्यों गया फैसला?

कर्नल पुरोहित को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगाए गए थे — जैसे आरडीएक्स का इंतज़ाम करना और बम बनाना — लेकिन अभियोजन इस बात के पुख्ता प्रमाण देने में असफल रहा। जांच में यह जरूर सामने आया कि उन्होंने कुछ लोगों से पैसे लिए थे, मगर इन पैसों का उपयोग घर बनाने और बीमा प्रीमियम भरने जैसे निजी कामों में हुआ। आतंक से संबंधित किसी लेन-देन का प्रमाण नहीं मिला।

इसके अलावा, अदालत ने यह भी माना कि न तो कर्नल पुरोहित ने किसी आतंकी संगठन की सदस्यता ली, और न ही वे किसी प्रकार की आपराधिक साजिश में शामिल पाए गए।