पैरेंट्स की ये 8 बुरी आदतें करती हैं बच्चों की परवरिश को प्रभावित, जानें और लाए बदलाव

पैरेंट्स होने के नाते बच्चों की अच्छी परवरिश का जिम्मा आप पर ही होता हैं। आप अपने बच्चों को क्या सिखाना चाहते हैं और किस ओर लेकर जाना चाहते हैं यह आपकी आदतों पर भी निर्भर करता हैं। जी हां, पैरेंट्स बच्चों के रोल मॉडल होते है। हर बच्चा बड़ा होकर अपने माता-पिता के जैसा ही बनना चाहता है। यही वजह है कि बच्चे पैरेंट्स की हर अच्छी-बुरी आदत की नकल करते हैं। बचपन में देखी गई पेरेंट्स की आदतों का बच्चों के आने वाले समय को प्रभावित करता हैं। पैरेंट्स को अपनी कुछ ऐसी आदतें छोड़ देनी चाहिए, जो बच्चों की परवरिश में रुकावट बनें। आज इस कड़ी में हम आपको पेरेंट्स की उन्हीं कुछ बुरी आदतों के बारे में बताने जा रहे हैं जो बच्चों की परवरिश को प्रभावित करती हैं। इन्हें जान जल्द बदलाव करने की जरूरत हैं।

टेलीविज़न देखने का समय


पैरेंट्स हों या बच्चे- सभी के लिए टीवी टाइम एक निश्चित समय सीमा में होना चाहिए। अगर पैरेंट्स ही कई-कई घंटों तक स्क्रीन के सामने बैठे रहेंगे, तो बच्चे भी ऐसा ही करेंगे। बच्चे को मनोरंजन का एकमात्र जरिया टीवी ही नज़र आता है, जिसके कारण उन्हें इलेक्ट्रॉनिक गैज़ेट और टेक्नोलॉजी की बुरी लत लग जाती है। अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि बच्चों में टेक्नोलॉजी की लत बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इसका बुरा असर बच्चों के बौद्धिक विकास पर पड़ सकता है और उनमें पढ़ाई और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसलिए बच्चे के लिए स्क्रीन टाइम तय करने से पहले पैरेंट्स अपने लिए भी टीवी की लिमिट निर्धारित करें।

ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना

साइकोलोजिस्ट के अनुसार, ज़्यादातर पैरेंट्स में यह बुरी आदत होती है कि हमेशा बच्चों पर चिल्लाते रहते हैं। दरअसल, बच्चों पर छोटी-छोटी बात पर चिल्लाना बिलकुल सही नहीं है। पैरेंट्स भूल जाते हैं कि उनके चिल्लाने की बुरी आदत का असर बच्चों पर भी पड़ता है और धीरे-धीरे उनमें भी यही आदत पनपने लगती है। कुछ बच्चे तो एंग्जायटी और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। इतना ही नहीं पैरेंट्स की इस आदत से पैरेंट्स-बच्चों के रिश्तों कड़वाहट आने लगती है। बेहतर होगा कि पैरेंट्स अपने पर नियंत्रण रखें। छोटी गलतियों पर बच्चे पर चिल्लाने की बजाय उसे प्यार से समझाएं।

तुलना करना


चाइल्डहुड डेवलपमेंट स्पेशलिस्ट का मानना है कि दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चे की तुलना करना- पैरेंट्स की सबसे बुरी आदत है। सबसे पहले तो पैरेंट्स अपनी इस गंदी आदत को छोड़ें और कभी भी दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चे की तुलना करने की कोशिश न करें। इसका बुरा असर बच्चों के विकास और वृद्धि पर पड़ता है। पैरेंट्स के ऐसे व्यवहार से बच्चे का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है और वो खुद को दूसरों से कम आंकने लगता है। अच्छा तो यही होगा कि पैरेंट्स बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। उनकी खूबियों पर ध्यान केंद्रित करें और उन्हें सराहें।

मारपीट

अनेक चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, हिंसा का कोई भी रूप यहां तक ​​कि सबसे छोटा थप्पड़, खतरनाक तरीकों से दर्दनाक हो सकता है, विशेष रूप से बच्चों में। भारतीय समाज में पैरेंट्स अक्सर इस तरह की गलती करते है। छोटी-छोटी बातों पर पैरेंट्स बच्चों पर हाथ उठाते हैं, उनके साथ मारपीट करते हैं। पैरेंट्स का बच्चों को समझाने का यह तरीक़ा बिलकुल सही नहीं है। बार-बार उन पर हाथ उठाने से बच्चे विद्रोही बन जाते हैं।

बॉडी शेमिंग


बच्चों में डिप्रेशन, एंग्जायटी और आत्मविश्वास की कमी होने का एक कारण बॉडी शेमिंग भी है। बॉडी शेमिंग यानी बच्चे का बहुत अधिक दुबला-पतला होना या फिर बहुत अधिक मोटा होना। यदि आपका बच्चा भी बहुत अधिक दुबला या मोटा है, तो उसे इसके लिए शर्मिंदा न करें। पैरेंट्स बच्चे की खामियों को इंगित करने की बजाय उनके सकारात्मक गुणों पर जोर दें।

गॉसिप करना

कुछ पैरेंट्स को गॉसिप करने की बुरी आदत होती है। उनकी यही आदत आगे चलकर बच्चों में पनपने है और बच्चे भी अपने दोस्तों के साथ गॉसिप करना शुरू कर देते हैं जो कि उनकी उम्र के हिसाब से गलत है।

धूम्रपान

कुछ पैरेंट्स की आदत होती कि वे बच्चों के सामने धूम्रपान करने करने से ज़रा भी परहेज़ नहीं करते। सेकंड हैंड स्मोकिंग से बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है। छोटे बच्चों के फेफड़े अभी पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं और धूम्रपान के कारण अविकसित फेफड़े कमजोर और बीमारियों का कारण बनते हैं। इसके अलावा जैसे-जैसे बच्चे होने लगते हैं, तो चोरी छिपे वे भी पैरेंट्स की इस आदत को फॉलो करने लगते हैं।

अपमानित करना

बच्चों के विकास के लिए जैसे प्रोत्साहित करना जरुरी है, वैसे ही उनको अपशब्द बोलना, उनका अपमान करना बच्चों के विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों को डिग्रडिंग यानी अपमानित करना शारीरिक शोषण के तहत नहीं आता, लेकिन इसे मानसिक और भावनात्मक शोषण के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और यह बच्चे के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों तरीक़े से बच्चे के जीवन पर बुरा असर डालता है। इसलिए जरुरी है कि बच्चे को सामाजिक रूप से दूसरे लोगों से जुड़ने के लिए प्रेरित करें, जिससे उनमें आत्मविश्वास पनपे।