जयपुर के एक निजी अस्पताल में दुर्लभ बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले एक मरीज की मौत की खबर सामने आई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मरीज लंबे समय से डायबिटीज से जूझ रहे थे और उनका हीमोग्लोबिन काफी कम हो गया था। उन्हें खून चढ़ाने की जरूरत थी, लेकिन उनका ब्लड ग्रुप बॉम्बे फीनोटाइप होने के कारण उपयुक्त रक्त की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, मरीज की बेटी का ब्लड ग्रुप भी यही था और उसने एक यूनिट रक्त दिया, लेकिन मरीज को इससे अधिक रक्त की जरूरत थी।यह घटना दुर्लभ रक्त समूहों की पहचान और जरूरत के समय उपयुक्त रक्तदाता मिलने की चुनौती की ओर ध्यान खींचती है। बॉम्बे ब्लड ग्रुप को मेडिकल भाषा में बॉम्बे फीनोटाइप (hh या Oh) कहा जाता है। यह कोई बीमारी नहीं है। इस ब्लड ग्रुप वाले लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं, लेकिन रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ने पर उनके लिए सही रक्तदाता खोजना कठिन हो सकता है।
क्या है बॉम्बे ब्लड ग्रुप?आमतौर पर लोगों का ब्लड ग्रुप A, B, AB या O होता है। इन रक्त समूहों की पहचान लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर मौजूद विशेष एंटीजन के आधार पर की जाती है। बॉम्बे फीनोटाइप में H एंटीजन मौजूद नहीं होता, जबकि सामान्य ABO रक्त समूहों में यह एंटीजन पाया जाता है। H एंटीजन, A और B एंटीजन बनने की प्रक्रिया में आधार की तरह काम करता है। इसकी अनुपस्थिति के कारण बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं पर A और B एंटीजन भी नहीं बनते।इसकी एक अहम विशेषता यह है कि सामान्य जांच में बॉम्बे ब्लड ग्रुप का नमूना O ग्रुप जैसा दिखाई दे सकता है। लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं। सामान्य O ग्रुप के रक्त में H एंटीजन मौजूद रहता है, जबकि बॉम्बे फीनोटाइप में यह अनुपस्थित होता है। इसलिए केवल सामान्य ABO जांच के आधार पर सही पहचान न हो पाने का जोखिम रहता है। इसकी पुष्टि के लिए विशेष रक्त-जांच की जरूरत पड़ सकती है।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति को O नेगेटिव खून क्यों नहीं चढ़ा सकते?रक्त चढ़ाने के मामले में बॉम्बे ब्लड ग्रुप की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसे सामान्य O ग्रुप का रक्त भी सुरक्षित रूप से नहीं दिया जा सकता। इस फीनोटाइप वाले लोगों के शरीर में H एंटीजन के खिलाफ एंटीबॉडी बन सकती हैं। यदि उन्हें ऐसा रक्त चढ़ाया जाए जिसमें H एंटीजन मौजूद है, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली रक्त कोशिकाओं पर हमला कर सकती है। इससे गंभीर और जानलेवा रक्त चढ़ाने संबंधी प्रतिक्रिया हो सकती है।इसी वजह से बॉम्बे फीनोटाइप वाले मरीजों को आमतौर पर इसी रक्त समूह के दाता से लाल रक्त कोशिकाएं लेने की जरूरत होती है। O नेगेटिव रक्त को सामान्य परिस्थितियों में कई रक्त समूहों के लिए उपयोगी माना जाता है, लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मामले में यह विकल्प सुरक्षित नहीं है। ऐसे मरीज के लिए रक्त चढ़ाने से पहले रक्त समूह की सही पहचान और अनुकूलता की पुष्टि बेहद जरूरी होती है।
भारत में कितना दुर्लभ है यह रक्त समूह?नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (NCBI) की रक्त समूहों से जुड़ी संदर्भ सामग्री के मुताबिक, भारत में H एंटीजन की कमी वाला बॉम्बे फीनोटाइप लगभग हर 10,000 लोगों में एक व्यक्ति में पाया जा सकता है। यूरोप में इसकी अनुमानित आवृत्ति लगभग 10 लाख लोगों में एक है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और अध्ययनों में इसकी दर अलग हो सकती है, इसलिए इन आंकड़ों को अनुमान के रूप में समझना चाहिए।यह दुर्लभता रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ने पर बड़ी चुनौती बन सकती है। सामान्य रक्त समूहों के मुकाबले इसके अनुकूल दाता मिलने की संभावना कम होती है। यदि किसी मरीज को एक से अधिक यूनिट रक्त की आवश्यकता हो, तो पर्याप्त मात्रा जुटाना और भी मुश्किल हो सकता है। जयपुर के हालिया मामले की मीडिया रिपोर्ट में भी मरीज की बेटी द्वारा एक यूनिट रक्त दिए जाने के बावजूद अधिक रक्त की जरूरत का उल्लेख किया गया है।
किसने की थी बॉम्बे ब्लड ग्रुप की खोज?बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान वर्ष 1952 में तत्कालीन बॉम्बे, यानी आज के मुंबई में हुई थी। डॉ. वाई.एम. भेंडे और उनके सहयोगियों ने इस नए रक्त समूह से जुड़ी जानकारी प्रकाशित की थी। इसी शहर के नाम पर इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप कहा गया। इस खोज से यह समझने में मदद मिली कि कुछ लोगों की लाल रक्त कोशिकाओं पर सामान्य ABO रक्त समूहों से जुड़े एंटीजन के अलावा एक महत्वपूर्ण एंटीजन भी अनुपस्थित हो सकता है। इस खोज का महत्व केवल एक नए रक्त समूह की पहचान तक सीमित नहीं था। इससे यह समझना भी जरूरी हुआ कि सामान्य O ग्रुप जैसा दिखाई देने वाला हर रक्त नमूना वास्तव में O ग्रुप का नहीं होता। सही पहचान न होने पर गलत रक्त चढ़ाने से गंभीर प्रतिक्रिया का खतरा हो सकता है।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान कैसे होती है?सामान्य रक्त समूह जांच में A, B और Rh जैसे संकेतकों की जांच की जाती है। लेकिन बॉम्बे फीनोटाइप की पुष्टि के लिए अतिरिक्त जांच की जरूरत पड़ सकती है। मेडिकल साहित्य में एंटी-H लेक्टिन जांच और अन्य विशेष रक्त-जांच विधियों का उल्लेख किया गया है। कुछ मामलों में लार की जांच का उपयोग भी पुष्टि के लिए किया जाता है। जांच की सही विधि का चुनाव संबंधित प्रयोगशाला और चिकित्सकीय जरूरत के अनुसार किया जाता है।
क्या बॉम्बे ब्लड ग्रुप कोई बीमारी है?नहीं। बॉम्बे ब्लड ग्रुप होना अपने आप में कोई बीमारी नहीं है और इससे व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ्य पर अनिवार्य रूप से बुरा असर नहीं पड़ता। मुख्य समस्या तब सामने आती है, जब किसी दुर्घटना, ऑपरेशन, गंभीर एनीमिया या अन्य चिकित्सकीय स्थिति में रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। ऐसे समय में उपयुक्त रक्तदाता की तलाश और सही रक्त समूह की पुष्टि महत्वपूर्ण हो जाती है।