नाना पाटेकर की वो मराठी फिल्म जिसमें बने थे खौफनाक साइको विलेन, 2 साल तक सेंसर बोर्ड में अटकी रही थी ‘माफीचा साक्षीदार’

नाना पाटेकर भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन फिल्मों में निभाए उनके कई किरदार आज भी दर्शकों के बीच याद किए जाते हैं। मराठी सिनेमा में भी उन्होंने अलग-अलग तरह की भूमिकाओं के जरिए अपनी मजबूत पहचान बनाई। ऐसी ही एक फिल्म थी ‘माफीचा साक्षीदार’, जो अपनी कहानी के साथ-साथ रिलीज से पहले सामने आई सेंसर संबंधी मुश्किलों के कारण भी चर्चा में रही।

1986 में रिलीज हुई ‘माफीचा साक्षीदार’ क्राइम जॉनर की फिल्म थी। इसमें नाना पाटेकर के अलावा दत्ता भट्ट, बिंदु देसाई और मोहन गोखले जैसे कलाकार नजर आए थे। फिल्म की कहानी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित थी और इसमें नाना पाटेकर ने एक साइको विलेन की भूमिका निभाई थी। उन्होंने इस किरदार को बेहद गहन और प्रभावशाली अंदाज में निभाया था।

पुणे के चर्चित हत्याकांड से जुड़ी थी फिल्म की कहानी

‘माफीचा साक्षीदार’ की कहानी 1970 के दशक के मध्य में पुणे में हुए जोशी-अभयंकर मामले की वास्तविक घटनाओं पर आधारित थी। इसी मामले से जुड़ी कहानी को बाद में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘पांच’ से भी जोड़ा गया, हालांकि वह फिल्म सेंसर से जुड़ी समस्याओं के कारण रिलीज नहीं हो सकी। नाना पाटेकर की इस मराठी फिल्म को भी रिलीज तक पहुंचने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। फिल्म के निर्माण के बाद सेंसर बोर्ड ने इसके कुछ दृश्यों पर आपत्ति जताई। इसके चलते मामला दिल्ली स्थित रिवाइजिंग कमिटी तक पहुंचा और फिल्म की रिलीज का रास्ता आसान नहीं रहा।

सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के कारण दो साल तक अटकी रही फिल्म

रिलीज में देरी का असर फिल्म के निर्माताओं पर भी पड़ा। फिल्म को सेंसर से मंजूरी दिलाने की प्रक्रिया में काफी समय और संसाधन खर्च हुए। सेंसर से जुड़ी आपत्तियों के बाद स्क्रीनप्ले में कई बदलाव करने पड़े। कुछ दृश्यों को दोबारा शूट करने का फैसला भी लिया गया। फिल्म के निर्देशन में भी बदलाव हुआ। राजदत्त ने निजी कारणों से निर्देशन की जिम्मेदारी छोड़ दी, जिसके बाद वी. रवींद्र ने फिल्म के निर्देशन की कमान संभाली। इन तमाम बदलावों और सेंसर प्रक्रिया के कारण ‘माफीचा साक्षीदार’ करीब दो साल तक रिलीज का इंतजार करती रही। आखिरकार फिल्म 1986 में दर्शकों तक पहुंची।
बाद में हिंदी में ‘फांसी का फंदा’ नाम से डब हुई

फिल्म के कुछ दृश्यों को दोबारा शूट किए जाने के बाद इसके हिंदी वर्जन को लेकर भी फैसला लिया गया। फिल्म को हिंदी में ‘फांसी का फंदा’ नाम से डब किया गया। इस हिंदी वर्जन की डबिंग नाना पाटेकर ने खुद नहीं की थी। फिल्म की हिंदी डबिंग एक डबिंग आर्टिस्ट ने की थी। ‘माफीचा साक्षीदार’ नाना पाटेकर के करियर की उन फिल्मों में शामिल रही, जिसमें उन्होंने अपनी सामान्य छवि से अलग एक बेहद तीखा और गहन नकारात्मक किरदार निभाया। वास्तविक घटनाओं से जुड़ी कहानी, सेंसर बोर्ड की आपत्तियां, दोबारा शूट किए गए दृश्य और लंबे इंतजार के बाद हुई रिलीज ने इस फिल्म को नाना पाटेकर की मराठी फिल्मों में एक अलग पहचान दी। नाना पाटेकर का गुरुवार को कार्डियक अरेस्ट के बाद निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके प्रशंसक और फिल्म जगत उन्हें उनकी फिल्मों और यादगार किरदारों के जरिए याद कर रहे हैं। उनका अंतिम संस्कार पुणे में किया जाएगा।