‘औरों में कहां दम था’ की रिलीज फंडिंग पर विवाद, रिलायंस एंटरटेनमेंट स्टूडियोज के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू


अजय देवगन और तब्बू स्टारर फिल्म ‘औरों में कहां दम था’ की रिलीज से जुड़ी फंडिंग का विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है। मुंबई स्थित राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने रिलायंस एंटरटेनमेंट स्टूडियोज प्राइवेट लिमिटेड को कथित तौर पर 11.94 करोड़ रुपये की बकाया राशि से जुड़े मामले में कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) में भेजने की मंजूरी दे दी है। यह मामला फिल्म की रिलीज के लिए पेन इंडिया की ओर से उपलब्ध कराई गई राशि से संबंधित है।

एनसीएलटी की मुंबई पीठ ने 19 अगस्त को पारित आदेश में माना कि फिल्म की रिलीज के लिए पेन इंडिया की ओर से रिलायंस एंटरटेनमेंट स्टूडियोज को दी गई 20 करोड़ रुपये की राशि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत वित्तीय ऋण की श्रेणी में आती है। हालांकि, न्यायाधिकरण ने यह स्पष्ट किया कि पेन इंडिया को वास्तव में कितनी अंतिम राशि का भुगतान किया जाना है, इसका अभी निर्धारण नहीं किया गया है। दावे की जांच और राशि के निर्धारण की प्रक्रिया अब नियुक्त अंतरिम समाधान पेशेवर के स्तर पर होगी।

20 करोड़ रुपये की राशि से शुरू हुआ विवाद

विवाद की शुरुआत नवंबर 2022 में हुए एक सुरक्षा जमा समझौते से हुई थी। इसके तहत पेन इंडिया ने रिलायंस एंटरटेनमेंट स्टूडियोज को 20 करोड़ रुपये दिए थे। समझौते में 21 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ मासिक चक्रवृद्धि आधार पर राशि लौटाने की शर्त थी।

इसके बाद अक्टूबर 2023 में एक अन्य समझौता हुआ। इसके तहत रिलायंस से आंशिक रूप से जुड़ी कंपनी फ्राइडे फिल्मवर्क्स प्राइवेट लिमिटेड ने पेन इंडिया को 15 करोड़ रुपये का भुगतान किया। पेन इंडिया के अनुसार, इसके बाद 4.49 करोड़ रुपये मूलधन के रूप में बकाया रह गए, जबकि 7.44 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में देय थे। इस तरह पेन इंडिया ने कुल 11.94 करोड़ रुपये का दावा किया।

रिलायंस ने उठाए थे कई सवाल

रिलायंस एंटरटेनमेंट स्टूडियोज ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा था कि समझौते में दी गई राशि को स्पष्ट रूप से ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ यानी सुरक्षा जमा बताया गया था। कंपनी का तर्क था कि इसे धन उधार देने की व्यवस्था नहीं माना जा सकता।

कंपनी ने यह भी कहा कि समझौते में ऐसी व्यवस्था मौजूद थी जिसके तहत किसी तीसरे पक्ष के उपग्रह या डिजिटल अधिकार प्रदाता के माध्यम से भुगतान किया जाना था। रिलायंस का दावा था कि इस प्रावधान के कारण उसकी भुगतान संबंधी देनदारी समाप्त हो गई थी।

हालांकि, एनसीएलटी ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायाधिकरण ने कहा कि किसी लेन-देन का स्वरूप केवल उसमें इस्तेमाल किए गए शब्दों से तय नहीं होता, बल्कि उसकी वास्तविक प्रकृति और व्यावसायिक प्रभाव भी देखना जरूरी है। पीठ के अनुसार, इस लेन-देन में उधार की आवश्यक विशेषताएं मौजूद थीं।

न्यायाधिकरण ने तीसरे पक्ष के माध्यम से भुगतान वाले प्रावधान को भी रिलायंस की मूल देनदारी खत्म करने वाला नहीं माना। उसके अनुसार, यह केवल भुगतान का एक अतिरिक्त तरीका था और इससे कंपनी की प्राथमिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

भुगतान की समयसीमा तय करने के बाद भी नहीं हुआ भुगतान

एनसीएलटी ने रिलायंस के बाद के व्यवहार को भी अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना। अप्रैल 2024 में कंपनी ने बकाया राशि को दो किस्तों में चुकाने का प्रस्ताव रखा था। इसके तहत 30 जून और 30 सितंबर 2024 तक भुगतान किया जाना था।

इसके बाद अगस्त 2024 में भुगतान की संशोधित योजना सामने आई, जिसमें तीन किस्तों में राशि चुकाने की बात कही गई थी। अंतिम भुगतान 31 दिसंबर 2024 तक किया जाना प्रस्तावित था। हालांकि, संशोधित समयसीमा के अनुसार भी भुगतान नहीं किया गया।

न्यायाधिकरण ने माना कि बाद में भुगतान की किस्तों और समयसीमा को लेकर किए गए प्रस्ताव इस बात का संकेत देते हैं कि स्वयं रिलायंस ने बकाया राशि को स्वीकार किया था। ऐसे में बाद में समझौते की कुछ अन्य धाराओं के आधार पर देनदारी से इनकार करना उसके पहले के रुख से मेल नहीं खाता।

मनी लेंडिंग लाइसेंस की दलील भी खारिज

रिलायंस की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि पेन इंडिया महाराष्ट्र मनी-लेंडिंग कानून के तहत लाइसेंस प्राप्त किए बिना धन उधार देने का काम कर रही थी। एनसीएलटी ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।

न्यायाधिकरण ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि पेन इंडिया नियमित रूप से धन उधार देने के कारोबार में लगी हुई थी। पीठ के अनुसार, संबंधित लेन-देन एक विशेष व्यावसायिक समझौते से जुड़ा था, जिसका संबंध एक फिल्म परियोजना से था।
डिफॉल्ट को ‘विवादित’ दर्ज किए जाने का भी असर नहीं

मामले में नेशनल ई-गवर्नेंस सर्विसेज लिमिटेड की ओर से कथित डिफॉल्ट को ‘विवादित’ दर्ज किए जाने का मुद्दा भी सामने आया। रिलायंस ने इसका हवाला देते हुए पेन इंडिया की कार्रवाई पर सवाल उठाया था।

एनसीएलटी ने कहा कि इस आधार पर पेन इंडिया की ओर से दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की धारा 7 के तहत दायर आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि धारा 7 की कार्यवाही में किसी डिफॉल्ट के विवादित होने की स्थिति अपने आप आवेदन को अस्वीकार करने का आधार नहीं बनती।

अब रिलायंस एंटरटेनमेंट स्टूडियोज के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। न्यायाधिकरण ने इस प्रक्रिया के दौरान कंपनी पर धारा 14 के तहत मोरेटोरियम भी लागू किया है और उमेश बालाराम सोनकर को अंतरिम समाधान पेशेवर नियुक्त किया है। हालांकि, पेन इंडिया के दावे की अंतिम राशि अभी तय नहीं हुई है और आगे की प्रक्रिया में इसका निर्धारण किया जाएगा।

यह मामला फिल्म उद्योग में फिल्मों की रिलीज के लिए होने वाली वित्तीय व्यवस्थाओं और उनके तहत तय की जाने वाली भुगतान शर्तों को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।