श्री दुर्गा रक्षा कवच: नवरात्रि में करें संपूर्ण पाठ, पाएं अपूर्व शक्ति और सुरक्षा

नवरात्रि का पवित्र समय मां दुर्गा के प्रति भक्ति और सच्चे समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर श्री दुर्गा रक्षा कवच का पाठ विशेष महत्व रखता है। यह कवच, जिसे मार्कण्डेय पुराण में वर्णित किया गया है, मां दुर्गा की दिव्य शक्ति और सुरक्षा का आदान-प्रदान करता है। माना जाता है कि इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षित रहता है।

दुर्गा कवच का महत्व

देवी कवच का उपदेश भगवान ब्रह्मा ने श्री मार्कण्डेय ऋषि को दिया था। इस कवच का अर्थ है मां दुर्गा का सुरक्षा कवच, जो हर प्रकार के कष्ट, भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है। इसमें देवी के विभिन्न नाम, रूप और शक्तियों का वर्णन किया गया है। हर मंत्र, जो इस कवच में शामिल है, भक्त को मां दुर्गा की दिव्य शक्ति से जोड़ता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

कहते हैं जो व्यक्ति नवरात्रि में इसे श्रद्धा भाव से पढ़ता है, उसे मां दुर्गा की असीम शक्ति प्राप्त होती है। इसे पढ़ते समय पूरे मन और हृदय की एकाग्रता आवश्यक है।

ॐ नमश्चण्डिकायै।

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।

यन्न कस्य चिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

॥मार्कण्डेय उवाच॥

॥ब्रह्मोवाच॥

अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्।

दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्वा महामुने॥2॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥

पचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥

नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।

विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न ही॥7॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।

ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।

ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।

लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥

श्वेतरूपधारा देवी ईश्वरी वृषवाहना।

ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥ 11॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।

नानाभरणशोभाढया नानारत्नोपशोभिता:॥ 12॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्याः क्रोधसमाकुला:। शंखम चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥ 14॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुद्धानीथं देवानां च हिताय वै॥ 15॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।

महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्रि आग्नेय्यामग्निदेवता॥ 17॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।

ऊर्ध्वं ब्रह्माणी में रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥ 19॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहाना।

जाया मे चाग्रतः पातु: विजया पातु पृष्ठतः॥ 20॥

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।

शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥

मालाधारी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद् यशस्विनी।

त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥ 22॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।

कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥ 23॥

नासिकायां सुगन्‍धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।

अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥ 24॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।

घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥ 25॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्‍ वाचं मे सर्वमंगला।

ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धारी॥ 26॥

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।

स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्‍ बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चान्गुलीषु च।

नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥

स्तनौ रक्षेन्‍महादेवी मनः शोकविनाशिनी।

हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥ 29॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद्‍ गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुहे महिषवाहिनी॥30॥

कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।

पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादाध:स्तलवासिनी॥32॥

नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांशचैवोर्ध्वकेशिनी।

रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥ 34 ॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥35 ॥

शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।

अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।

वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।

सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।

यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।

पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।

राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥ 41॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।

तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥ 42॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥43॥

पदमेकं न गच्छेतु यदिच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यात्र यत्रैव गच्छति॥44॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥

निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रमेष्वपराजितः।

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥45॥

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रामपमृत्युविवर्जितः॥47॥

नश्यन्ति टयाधय: सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥ 48॥

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराशचैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला॥ 50॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥ 51॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्॥ 52॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्॥ 53॥

यशसा वद्धते सोऽपी कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चणण्डीं कृत्वा तु कवचं पूरा॥ 54॥

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिनयां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥

देहान्ते परमं स्थानं यात्सुरैरपि दुर्लभम्।

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ॐ॥ ॥ 56॥

।। इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम् ।

मां दुर्गा के नौ रूपों का वर्णन


शैलपुत्री – पर्वतों की संतान

ब्रह्मचारिणी – तपस्या और ज्ञान की देवी

चन्द्रघण्टा – साहस और वीरता की देवी

कूष्माण्डा – सृष्टि की रचयिता

स्कन्दमाता – मां के रूप में मातृत्व

कात्यायनी – धर्म और न्याय की प्रतीक

कालरात्रि – अंधकार और बुराई के विनाशक

महागौरी – शांति और सौंदर्य की देवी

सिद्धिदात्री – सम्पूर्ण सिद्धि देने वाली

यह कवच केवल देवी की पूजा ही नहीं, बल्कि जीवन में हर संकट से रक्षा का माध्यम भी है।

कवच का प्रभाव


श्री दुर्गा कवच के पाठ से:

- भूत, प्रेत, दुष्टात्माओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।

- मानसिक शांति और साहस की वृद्धि होती है।

- शरीर और मन दोनों में ऊर्जा का संचार होता है।

- जीवन में सुख, समृद्धि और सम्मान की प्राप्ति होती है।

कवच में मां दुर्गा के सभी रूपों के मंत्रों का उल्लेख है, जैसे चामुण्डा, वाराही, ऐन्द्रि, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, लक्ष्मी, श्वेतरूपधारा, ब्राह्मी आदि। इन मंत्रों के माध्यम से प्रत्येक दिशा में सुरक्षा की कामना की जाती है।

दस दिशाओं की रक्षा


कवच में मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को शत्रुओं और बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए दश दिशाओं में रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है। इससे भक्त के चारों ओर अदृश्य सुरक्षा का कवच बन जाता है।

शरीर के अंगों की सुरक्षा

इस कवच में न केवल दिशाओं की, बल्कि शरीर के प्रत्येक अंग की भी रक्षा की गई है। मस्तक, नेत्र, कान, नाक, मुख, कंठ, हाथ-पांव, हृदय और नाभि तक सभी का विशेष ध्यान रखा गया है। यही कारण है कि इसे संपूर्ण कवच कहा जाता है।

पाठ का लाभ

- नित्य पाठ से भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है।

- भय, शोक और दुख से मुक्ति मिलती है।

- आयु, यश, धन और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।

- परिवार और समाज में सम्मान और सफलता प्राप्त होती है।