5 नवंबर को मनाई जाएगी गोवत्स द्वादशी, 6 नवंबर की सुबह खत्म होगी द्वादशी तिथि

गोवत्स द्वादशी का पर्व इस साल 5 नवंबर 2026, गुरुवार को मनाया जाएगा। इसे वसु बारस, वाघ बारस और नन्दिनी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की जाती है। मान्यता है कि गोवत्स द्वादशी का व्रत रखने और गौ माता की पूजा करने से संतान को सुखी और दीर्घायु जीवन का आशीर्वाद मिलता है। यह पर्व धनतेरस से एक दिन पहले पड़ता है और दीपावली से जुड़े त्योहारों की शुरुआत का संकेत देता है। इस बार गोवत्स द्वादशी की तारीख को लेकर भ्रम इसलिए हो सकता है, क्योंकि द्वादशी तिथि 5 नवंबर की सुबह शुरू होकर अगले दिन यानी 6 नवंबर की सुबह तक रहेगी। पंचांग के अनुसार, द्वादशी तिथि 5 नवंबर को सुबह 10:35 बजे शुरू होगी और 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे समाप्त होगी। तिथि के शाम के समय रहने के आधार पर गोवत्स द्वादशी 5 नवंबर को मनाई जाएगी।

गोवत्स द्वादशी 2026 की सही तारीख और शुभ मुहूर्त

गोवत्स द्वादशी को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा या 6 नवंबर को। पंचांग के अनुसार, इस साल गोवत्स द्वादशी 5 नवंबर, गुरुवार को है। द्वादशी तिथि 5 नवंबर की सुबह 10:35 बजे से शुरू होकर 6 नवंबर की सुबह 10:30 बजे तक रहेगी। पूजा के लिए शाम का समय महत्वपूर्ण माना जाता है। जयपुर के स्थानीय पंचांग के अनुसार, 5 नवंबर को सूर्यास्त लगभग शाम 5:41 बजे होगा और प्रदोष काल में गोवत्स द्वादशी की पूजा का समय लगभग शाम 5:41 बजे से रात 8:17 बजे तक बताया गया है। अलग-अलग पंचांग गणना और स्थान के अनुसार समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग देखना उचित रहेगा।

गोवत्स द्वादशी 2026 - विवरण

पर्व की तारीख - 5 नवंबर 2026, गुरुवार
द्वादशी तिथि प्रारंभ - 5 नवंबर, सुबह 10:35 बजे
द्वादशी तिथि समाप्त - 6 नवंबर, सुबह 10:30 बजे
जयपुर में प्रदोष पूजा का समय - लगभग शाम 5:41 से रात 8:17 बजे तक
अगला पर्व - धनतेरस, 6 नवंबर 2026

गोवत्स द्वादशी की पूजा विधि

गोवत्स द्वादशी पर गाय और उसके बछड़े की पूजा करने की परंपरा है। इस दिन महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना से व्रत रखती हैं। पूजा के लिए सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा की तैयारी करें।

- सबसे पहले गाय और बछड़े को स्नान कराएं या साफ कपड़े से उन्हें स्वच्छ करें। अगर घर में गाय-बछड़ा उपलब्ध नहीं है, तो उनकी मूर्ति या चित्र रखकर पूजा कर सकते हैं।
- गाय और बछड़े का शृंगार करें। उनके माथे पर हल्दी और कुमकुम लगाएं।
- इसके बाद रोली, अक्षत, फूल, फल, मिठाई, धूप और दीपक से विधिपूर्वक पूजा करें।
- पूजा के दौरान गाय और बछड़े को हरा चारा, गुड़-चना या उनके लिए उपयुक्त खाद्य सामग्री अर्पित करें।
- दिनभर व्रत रखने के साथ गौ सेवा करें।
- शाम को दोबारा पूजा करें और गोवत्स द्वादशी की कथा सुनें।
- पूजा पूरी होने के बाद अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भोजन ग्रहण करें।

पूजा के दौरान पशुओं को कोई ऐसी सामग्री न खिलाएं जो उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो। पूजा का उद्देश्य गौ माता और बछड़े के प्रति सम्मान और सेवा का भाव रखना है।
गोवत्स द्वादशी का महत्व

धार्मिक मान्यताओं में गोवत्स द्वादशी को संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, उन्नति और खुशहाल जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। गाय और बछड़े की एक साथ पूजा करना इस पर्व की प्रमुख परंपरा है। वसु बारस नाम के पीछे भी धार्मिक मान्यता जुड़ी है। इस दिन वसु नामक धन के अधिपति देवता की पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है। इसी वजह से इसे वसु बारस कहा जाता है। वहीं, नन्दिनी व्रत नाम भी इस पर्व के लिए प्रचलित है।

इस दिन गाय का दूध और उससे बने पदार्थ क्यों नहीं खाते?

गोवत्स द्वादशी पर गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। मान्यता है कि यह दिन गौ माता के विश्राम और सम्मान के लिए समर्पित होता है। इसी कारण कई परंपराओं में इस दिन गाय का दूध और उससे बने पदार्थों का सेवन वर्जित माना जाता है। कुछ क्षेत्रों और परिवारों में व्रत के दौरान भोजन के अलग नियम अपनाए जाते हैं। इसलिए दूध, दही, घी और अन्य दुग्ध उत्पादों के सेवन को लेकर स्थानीय परंपरा के अनुसार निर्णय लिया जाता है। इस नियम को हर क्षेत्र के लिए एक जैसा मानना सही नहीं होगा।

गोवत्स द्वादशी और बछ बारस में क्या अंतर है?

गोवत्स द्वादशी को कई जगह बछ बारस के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में बछ बारस नाम से एक अलग पर्व भी मनाया जाता है। यह पर्व गोवत्स द्वादशी से लगभग दो महीने पहले पड़ता है। दोनों अवसरों पर गाय और बछड़े की पूजा की जाती है और संतान की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इन पर्वों की तारीख और भोजन से जुड़े नियम अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भाद्रपद कृष्ण द्वादशी पर बछ बारस मनाने की परंपरा है, जबकि कार्तिक कृष्ण द्वादशी पर गुजरात और महाराष्ट्र में वसु बारस या गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है।

नोट: यह जानकारी ज्योतिषीय मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। व्यक्तिगत जीवन में किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।