मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्र और धर्म के संबंध को लेकर कहा कि भारतीय परंपरा में दोनों को अलग-अलग नहीं देखा जाता। अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें वार्षिक सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र का उद्देश्य धर्म से जुड़ा है और धर्म राष्ट्र की सेवा से जुड़ा हुआ है। उनके मुताबिक, दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं और राष्ट्र के कमजोर होने पर धर्म के सामने भी खतरा पैदा होता है।
भागवत ने इस दौरान लोगों से राष्ट्र और धर्म से जुड़े विचारों को केवल उपदेश के रूप में लेने के बजाय उन्हें अपने आचरण में उतारने की बात कही। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए यह जरूरी है कि वह इन विचारों को अपने कर्मों के माध्यम से सामने रखे। उन्होंने संघ के कार्यकर्ताओं का उदाहरण देते हुए कहा कि लाखों लोग बिना किसी अपेक्षा के अपना समय और पैसा देश की सेवा में लगाते हैं।
समर्पण को बताया जीवन को सार्थक बनाने का माध्यमआरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन में समर्पण के महत्व पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का समर्पण किसी नेक, दिव्य, सुंदर या पवित्र उद्देश्य के लिए हो, तो वही समर्पण उसके जीवन को स्वर्ग जैसा बना सकता है।
उन्होंने सम्मेलन में मौजूद लोगों से कहा कि उन्हें ऐसे उद्देश्य के लिए खुद को समर्पित करने का अवसर मिला है। भागवत के मुताबिक, जीवन में कोई सार्थक उद्देश्य तलाशने के लिए व्यक्ति को कई जन्मों तक तपस्या करनी पड़ सकती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि संभव है कि लोगों ने अपने किसी पिछले जन्म में ऐसा प्रयास किया हो, जिसके कारण उन्हें आज इस उद्देश्य के लिए काम करने का अवसर मिला है।
राष्ट्र और धर्म को एक-दूसरे से जुड़ा बतायामोहन भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा में राष्ट्र और धर्म को अलग-अलग नहीं माना गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है, जबकि धर्म राष्ट्र की सेवा के लिए है। उनके अनुसार, दोनों के बीच ऐसा संबंध है कि एक के कमजोर होने का असर दूसरे पर भी पड़ता है।
उन्होंने कहा कि जब राष्ट्र कमजोर होता है तो धर्म पर खतरा आता है और जब धर्म का अभ्यास कमजोर पड़ता है तो राष्ट्र के पतन की स्थिति बनती है। भागवत ने इसे दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ने की जिम्मेदारी से जोड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि पढ़ाई के प्रति समर्पित युवा यदि ज्ञान परंपरा की रक्षा के लिए अपना समय देते हैं तो यह राष्ट्रीय कार्य के साथ-साथ धर्म का कार्य भी है।
दुनिया की चुनौतियों के बीच संतुलन की बातअपने संबोधन में भागवत ने दुनिया के सामने मौजूद असंतुलन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हर खुशी किसी न किसी स्तर पर अधूरी रह जाती है और हर आकांक्षा के साथ कोई न कोई नुकसान जुड़ा होता है। उनके अनुसार, एक निष्ठा का दूसरी निष्ठा से टकराव भी देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में अतिवाद की स्थिति है और संतुलन तथा मध्यम मार्ग का अभाव दिखाई देता है। भागवत ने इसी संदर्भ में कहा कि दुनिया भारत से आगे का रास्ता निकलने की उम्मीद करती है।
भारत की परंपरा और दुनिया के सामने उसकी भूमिका का किया उल्लेखमोहन भागवत ने भारत की ऐतिहासिक ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 3,000 वर्षों तक भारत ने किसी दूसरे देश पर विजय हासिल किए बिना, किसी का धर्म परिवर्तन कराए बिना और किसी मुद्दे पर हमला किए बिना दुनिया को सुख और शांति का रास्ता दिखाया था।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से दुनिया को भारत से उम्मीदें हैं। सम्मेलन में उन्होंने राष्ट्र, धर्म और ज्ञान परंपरा की रक्षा को एक-दूसरे से जुड़ा विषय बताया और इसे व्यवहार में उतारने पर जोर दिया।
सम्मेलन में संघ के कार्यकर्ताओं और छात्रों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया।